अनवारूल हक
देश का आम मुसलमान पेसोपेश में है। आज से नहीं बल्कि पिछले साठ वर्षों से है। कभी उसके समर्पण का इम्तहान होता है तो कभी उसको शक के दायरे में खड़ा कर दिया जाता है। कई मौके तो ऐसे भी आते हैं जब सिर्फ और सिर्फ एक मुसलमान को ही अपने भारतीय होने की या पिफर कहें कि भारतीयता की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती मिलती है। इसमें वह मासूम और अपनी ही दुनिया में मशगूल मुसलमान भले ही बेकसूर हो, पर उसको कसूरवार बनाने का जुर्म हो रहा है और ऐसे जुर्म को अंजाम देने वाले भी गैर नहीं, बल्कि उन्हीं में से चंद हैं।कोई मजहब के नाम पर, कोई जिहाद के नाम पर तो कोई किसी बाहरी ताकत की पफरमानी के नाम पर या तो खुद गुमराह हो जाता है या फिर चंद लोगों को उस रास्ते पर धकेल देता है जो केवल वतनखिलापफी की ओर जाता है। नतीजा कोई और भुगतता है। कभी-कभार तो पूरी कौम जवाबदेह हो जाती है। ऐसे मौके पर मुस्लिम लीडरशिप का असल इम्तहान होता है, लेकिन अफसोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि एक मुसलमान को तो अब तक अपने रहनुमाओं से नाउम्मीदी ही हाथ लगी है।मसला आतंकवाद का हो, कश्मीर का हो, देश के किसी संवेदनशील मुद्दे का हो या पिफर ऐटमी डील का हो, हर जगह मुसलमानों को अलग-थलग करने की शातिराना कोशिश होती है और नतीजतन पूरी कौम पर एक इल्जाम, वह भी देश की मुख्यधरा से अलग होने का, स्वतः ही लग जाता है। देश के ज्यादातर मसलों पर मुसलमानों को अलग रखकर दृष्टिकोण बनाने का सिलसिला नया तो नहीं है। परंतु एक बात जरूर है कि उनको हमेशा ही देश के दूसरे समुदायों से अलग रखकर तौलने का क्रम मौजूदा दौर ज्यादा बढ़ा है।सवाल कई हैं। सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों है? इसका जवाब तलाशने की कोशश तो की ही जा सकती है। महत्वपूर्ण बात यह भी है आज जब हर जगह वैश्वीकरण और आध्ुनिकता की बयार चल रही तो ऐसे में मुसलमानों के लिए कोई दूसरा मानदंड तो नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। जिस सवाल को यहां खड़ा किया गया है, वह मजहबी तो हरगि”ा नहीं है, सियासी जरूर है। सियासी इसलिए भी है कि मुसलमान भी देश की हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बराबर का भागीदार और वाजिब हकदार है।वास्तविक के धरातल पर तस्वीर दूसरी है। कई बार ऐसा होता है जब देश के मुसलमानों को बाकी देश के साथ नजर आना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मुसलमानों को अलग-थलग रखने की साजिश होती है और ऐसा नजर आने लगता है कि वे देश की अवाम से अलग हैं। हाल ही में न्यूक्लियर डील को बेवजह मुस्लिम हितों के साथ जोड़ा गया। इस पर मुस्लिम समाज में जोरदार विरोध् होना चाहिए था। विरोध् तो हुआ, लेकिन एक स्वर में नहीं। यह बात थोड़ा हैरान करने वाली थी कि उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम-मजहबी लीडरों ने इस पर अपने पफायदे को माप-तौलकर बयानबाजी किया। कई उलेमा तो नंगे पांव उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्राी मायावती के दरबार तक पहुंच गए। उनका वहां पहुंचने का मकसद अपनी कौम की भलाई तो कतई नहीं था, बल्कि उसमें सियासत की बू सापफ नजर आ रही थी।ऐटमी डील पर देश के आम मुसलमान भले ही कोई ऐतराज न करे, लेकिन उनकी रहनुमाई का दावा करने वाले कुछ रहनुमाओं को इस पर ऐतराज था। इस ऐतराज का आधर क्या था? सिपर्फ और सिपर्फ अमेरिका। यह बात सही है कि अमेरिका से मुसलमानों का ऐतराज है और कुछ मामलों में यह तर्कसंगत भी है। वह इसलिए कि इराक, अफगानिस्तान और कुछ हद तक पिफलिस्तीन में अमेरिका की नीतियों से इन देशों के बाशिंदों को हिंसा का घोर तांडव झेलना पड़ा है और वे बाशिंदे मुसलमान हैं। ऐसे में आम मुसलमानों के अंदर भी अमेरिका को लेकर आक्रोश से भरी सोच का पनपना स्वाभाविक ही कहा जाएगा।परंतु सवाल यह है कि दुश्मनी या आक्रोश तो अमेरिका के साथ है, भारत के साथ तो नहीं। ऐटमी डील की वकालत करते हुए देश की सरकार जब बार-बार कह रही है कि इसमें भारत का महत्वपूर्ण हित जुड़ा है तो देश के हर कौम के नागरिक को, चाहे वह किसी मजहब का हो, डील का समर्थन करना चाहिए। लेकिन मुसलमानों के नजरिए से यह नहीं दिखा। कहने का मतलब यह है कि मुस्लिम रहनुमाई इस पर दोमुंहा राग अलापती नजर आई। यह बात दीगर है कि आम मुसलमान जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस कदर मशगूल है कि उसे डील की समझ शायद ही हो सकती है, उसने नाराजगी नहीं जताई। शायद उसे डील की परवाह इस मायने में भी न हो कि यह अमेरिका के साथ हो रही है। लेकिन अपफसोसनाक बात यह है कि कुछ लोगों ने मुसलमानों को इस मसले पर भी अलग-थलग करने का काम किया और वे सपफल भी रहे।केवल डील ही नहीं, देश और मसलों पर मुसलमानों को अलग करने की कोशिशें होती हैं और ऐसा करने वालों को दुर्भाग्यवश कामयाबी मिल जाती है। आतंकवाद के मुद्दे पर तो लोगों को बरगलाने और अनजान और बेकसूर मुसलमानों को भी कटघरे में खड़ा करने से परहेज नहीं किया जाता। आज आलम यह हो चुका है कि दुनिया के हर कोने में एक आम मुसलमान को भी शक की निगाह से देखा जाता है।आतंकवाद से अलग, अभी हाल ही कश्मीर में जब श्राइन बोर्ड की जमीन को लेकर बवाल खड़ा हुआ तो देश की मुख्यधरा से अलग एक बार पिफर मुसलमानों को अलग करने की कोशिश की गई और सारे मुसलमान नेताओं ने इस पर अपना मुंह सिल लिया। क्या जरूरत इस बात कि नहीं थी कि मुस्लिम लीडरशिप खुद को ऐसे मसलों पर स्पष्ट करे, जो संवेदनशील होते हैं। ऐसे मुद्दे पर मुस्लिम लीडरशिप की खामोशी आम मुसलमानों को ही नुकसान पहंुचाने का काम करती है।सवाल यह है कि मुसलमानों को गुमराह करने और उनकी बेचारगी का पफायदा उठाने का सिलसिला कब थमेगा? इसको रोकने के रास्ते क्या हैं? क्या मुसलमान इस हद तक जागरूक नहीं हैं कि वह खुद के इस्तेमाल को समझ सके? वह भला देश की धरा से क्यों अलग चलना चाहेगा? ऐसे कई सवाल हैं जो उठाए जा सकते हैं। लेकिन सबका जवाब सबसे पहले मुस्लिम कौम को ही देना होगा। बड़ी जिम्मेदारी मुस्लिम रहनुमाई की भी है। उसे अपनी भूमिका पर दोबारा सोचना होगा और अपनी लाइन भी बदलनी होगी। उनको इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि उन पर अब और कीचड़ न उछले। दायित्व उस आम मुसलमान का भी है जो तरक्कीपंसद है कि वह खुद को देश की मुख्यधारा से जोड़ कर चले। इसके बाद ही उस पर उठने वाली हर उंगली स्वतः ही गिर जाएगी।
शुक्रवार, 8 अगस्त 2008
मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों?
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