शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

मुगाबे तानाशाह हुआ...

अनवारूल हक
कभी उसे एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने अपना मसीहा माना था और यह मानकर उसे अपने मुल्क की बागडोर सौंपी थी कि वह उनकी बदहाली को खुशहाली में बदल देगा। परंतु वह शख्स लोगों का मसीहा तो न बन सका, लेकिन उनकी जिंदगी की बदतरी का निर्माता जरूर बन गया। यहां बात अफ्रीकी महाद्वीप के बदहाल देश जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति राॅबर्ट मुगाबे की हो रही है। पिछले तीस सालों से जिम्बाब्वे पर अपना चाबुक चला रहे मुगाबे किसी भी सूरत में झुकने को तैयार नहीं दिखते। कुछ महीने पहले संपन्न उस चुनाव में उन्होंने खुद को विजेता घोषित कर लिया, जिसकी विश्वसनीयता एक फीसदी भी नहीं है। दुनिया के बड़े- बड़े पर्यवेक्षक इस चुनाव को बेमानी करार दे चुके हैं। अप्रैल 2008 में जब जिम्बाब्वे में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुआ तो मुगाबे के प्रतिद्वंद्वी माॅगर्न स्वानागिरे ने पहले चरण में मुगाबे को पराजित कर दिया। इसके बाद मुगाबे के समर्थकों ने हिंसा का तांडव पूरे देश में मचा दिया और मजबूरन माॅर्गन को चुनाव के दूसरे चरण से खुद को अलग करना पड़ा। कुछ दिनों पहले जब मुगाबे ने खुद को विजयी करार दिया तो उनकी खूब छीछालेदर हुई। चैतरपफा घिरने के बाद वे थोड़ा नरम पड़े। परंतु अभी वही पुरानी मनमानी दोहरा रहे हैं कि वे किसी भी हाल में राष्ट्रपति की कुर्सी पर बने रहना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे बातचीत के लिए तभी तैयार होंगे जब सभी पक्ष उनको राष्ट्रपति मानने के लिए तैयार होंगे। उनकी इस जिद से अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक भी असमंजस में पड़ गए हैं कि वे मुगाबे से बातचीत कैसे बढ़ाएं? उल्लेखनीय है कि दुनिया के सभी बड़े देशों ने जिंबाब्वे को दी जाने वाली मदद तो रोक ही दी, साथ ही कई तरह के प्रतिबंध् भी लगा दिए हैं। प्रतिबंध् लगाने के मामले में अमेरिका और ब्रिटेन सबसे आगे रहे। लेकिन दूसरी ओर रूस और चीन ने मुगाबे के खिलापफ उठाए कदमों पर वीटो कर दिया। मुगाबे के प्रति मुगाबे की नाराजगी का आलम यह रहा कि ब्रिटेन ने उनको दिया गया नाईटहुड सम्मान भी वापस ले लिया। यह जिम्बाब्वे का दुर्भाग्य रहा कि देश पहले अंग्रेजी शासन का गुलाम रहा और अब अपने ही एक नेता का गुलाम है। 18 अप्रैल 1980 की तारीख जब ब्रिटेन ने जिम्बाब्वे को आजाद घोषित किया, उस समय पूरी दुनिया को लगा कि अफ्रीकी महाद्वीप का यह तंगहाल देश अब तरक्की की नई इबारत लिखेगा। लेकिन लोगों की यह उम्मीद परवान न चढ़ सकी। जिम्बाब्वे की आजादी से लेकर अब तक पूरी दुनिया ने भले ही बहुत कुछ बदलाव देख लिया हो लेकिन इस मुल्क की अवाम ने बदलाव के नाम पर सिर्फ इतना देखा कि उनकी बदहाली का ग्रापफ पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया। मुगाबे ने अपने 30 साल के शासनकाल के दौरान कुछ काम जरूर किए जिसे देश की जनता के लिए शुरू हितकर कहा गया। जिम्बाब्वे की जमींदारी प्रथा को तोड़ने का काम सर्वप्रथम उन्होंने ही किया। लेकिन आज तक जमीनों का उचित बंटवारा न हो सका। नतीजा यह रहा कि जमीन के लिए हिंसा का लंबा दौर चला। मौजूदा समय में जिम्बाब्वे दुनिया का एक ऐसा देश है जहां के हर सेक्टर में विकास दर शून्य के बराबर है। यही नहीं मंहगाई आसमान छू रही है और लोग बुनियादी जरूरतों को तरसने लगे हैं। एक अनुमान के अनुसार सन् 2000 से जिम्बाब्वे के अंदर 32 फीसदी सेे भी ज्यादा की दर से मंहगाई बढ़ी। वर्तमान समय में जिम्बाब्वे में बेरोजगारी की दर 80 फीसदी है। अगर देश में औसत आयु की बात करें तों पुरुषों की औसत उम्र 37 साल है तो वहीं औरतों की 34 साल है। जिम्बाब्वे की बदहाली के लिए पूरी दुनिया भले ही मुगाबे को कोस रही हो, पर मुगाबे खुद को इसके लिए जिम्मेदार नहीं मानते। उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोप की गलत नीतियां भी कापफी हद तक उनके मुल्क को बदहाल बनाने के लिए जिम्मेदार हैं। गौर करने वाली बात है कि वे माक्र्सवादी विचारधरा के नेता हैं और संभवतः यही वजह है कि उनकी अमेरिका जैसे देश से नहीं बनी। अब जब खुद उनके देश के लोग उनसे त्रस्त आ चुके हैं तो मुगाबे कैसे राष्ट्रपति बने रह सकते हैं? इस सवाल को आज हर कोई पूछ रहा है। मुगाबे की बात करें तो उनके पास इसका एक ही जवाब है उनके सिवाय कोई दूजा जिम्बाब्वे की सत्ता नहीं संभाल सकता।

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