रविवार, 10 अगस्त 2008

.राजनाथ सिंह का साक्षात्कार

.सूर्यकान्त बाली के साथ अनवारूल हकपीएन शाही
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में दावा किया था कि भाजपा आज देश की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। ‘देश की सबसे बड़ी पार्टी कौन’, इस विषय पर अपन पत्रिका के इस अंक की आवरण कथा लिखने के अवसर पर भाजपा अध्यक्ष से इस पर बातचीन होना स्वाभाविक ही था। राज सरोकार टीम जब भापजा अध्यक्ष से बातचीत करने उनके दिल्ली आवास पर गई तो इस मुख्य विषय के साथ साथ अन्य जिन विषयों पर उनसे संवाद हुआ , वही संवाद पाठकों के लिए अविकल रूप से प्रस्तुत है:
क्या देश के 12 राज्यों में सत्तासीन होने को आधार बनाकर आपने कहा है कि भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है?
केवल इसी आधार पर मैंने यह दावा नहीं किया कि भाजपा सबसे बड़ा दल है। अगर आप विश्लेषण करेंगे तो पता चलेगा कि जिन राज्यों में हमारी पार्टी की सरकारें हैं, वहां कुल 200 से अधिक लोकसभा क्षेत्रा आते हैं। वहीं कांगे्रस की जहां सरकारें है वहां यह आंकड़ा 150 से भी कम होगा। यही नहीं अब तो हमने कर्नाटक के साथ दक्षिण भारत में प्रवेश कर लिया है। इसका मतलब यह कि हमारी पार्टी अब संपूर्ण भारत की पार्टी है और सबसे बड़ी पार्टी भी है।
पार्टी की इस सफलता को आप कैसे आंकते हैं?
स्वतंत्रा भारत में यह पहली बार हुआ है कि कोई दल कांग्रेस से आगे निकलने में कामयाब रहा है। अब हम सांगठनिक और भौगोलिक दोनों तरह से कांग्रेस या किसी भी अन्य राजनीतिक दल से आगे निकल चुके हैं। निश्चित तौर पर यह पार्टी के लिए बहुत बड़ी सपफलता है। मौजूदा समय में देश के 65 प्रतिशत मतदान केंद्रों पर हमारी पहुंच है। इसे और भी ज्यादा बढ़ाने के लिए मैं अपने कार्यकर्ताओं से अपील कर चुका हूं। मुझे विश्वास है कि पार्टी अभी और आगे बढ़ेगी।
कांग्रेस का आरोप है कि कर्नाटक में आपको धुप्पल में ही सपफलता मिली है।
देखिए, मेरे इस दावे को कि भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है, कांग्रेस भी इसको गलत बताने का साहस नहीं दिखा पाई क्योंकि यह सच्चाई है। कर्नाटक में जनता ने कांग्रेस और जे डी;एसद्ध दोनों को नकार दिया और भाजपा में अपना विश्वास जताया है। येदियुरप्पा के नेतृत्व को भी कर्नाटक की जनता ने स्वीकार किया है।
कर्नाटक के बाद क्या भाजपा पूरे दक्षिण भारत मंें इसी तरह का कारनामा दोहरा पाएगी?
कर्नाटक ने हमारे लिए दक्षिण में एक द्वार खोलने का काम किया है। मैं इतना निश्चित तौर से कह सकता हूं कि दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में फिलहाल हमारी सरकार भले ही न बने परंतु हम अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में सपफल होंगे। लोगों का पार्टी में विश्वास बढ़ा है। पहले इसे उत्तर की पार्टी कहा जाता था। फिर पूरब की पार्टी बनी। इसके बाद भाजपा पूरे उत्तर भारत की पार्टी बनी। अब पार्टी जब दक्षिण भारत में सत्तासीन हुई है तो इसे अखिल भारतीय पार्टी ही मानी जाएगी।
वह राज्य, जहां पार्टी कभी नंबर एक की पोजीशन पर थी, आज वहां हालत खराब है। इसके बारे में क्या कहेंगे?
मुझे पता है कि आप उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं। वहां हमने सरकार भी चलाई और कई सफलताएं पाईं। लेकिन पिफलहाल पार्टी की हालत प्रदेश में पहले जैसी नहीं है। हमें उम्मीद है कि वहां एक बार पिफर पार्टी पहले वाली स्थिति में आएगी।
उत्तर प्रदेश में पार्टी क्यों इतनी बुरी स्थिति में पहंुची ?
पार्टी को राज्य में नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि वहां कुछ ऐसी राजनीतिक गतिविध्यिां हुई जिससे पार्टी को हानि पहंुची। बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने से भाजपा को नुकसान ही पहंुचा।
क्या उत्तर प्रदे’ा में बसपा के साथ गठबंध्न एक भूल थी?
मैं इसे भूल नहीं कहूंगा। वह एक प्रयोग था जो सपफल नहीं हो सका। वह प्रयोग प्रदेश के हित के लिए किया गया था क्योंकि हम चाहते थे कि प्रदेश जल्दी जल्दी चुनाव में न जाए।
उस असफल प्रयोग को दोहराया क्यों गया?
मैं इतना कहूंगा कि बसपा के साथ हमारा प्रयोग अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।

ऐसी अपफवाहें उड़ रहीं हैं कि बसपा और भाजपा में पिफर गठबंध्न होने जा रहा है। क्या यह सच है?

नहीं। फिलहाल ऐसी कोई संभावना नहीं है।
राजस्थान में भाजपा सरकार दो जातियों गुर्जर और मीणा को एक साथ नहीं रख पाती है। वहीं उत्तर प्रदेश में बसपा ब्राह्मण और दलितों को एक साथ लाने में सफल रही है।
देखिए, यह बसपा की तात्कालिक सपफलता है। हम तात्कालिक लाभ के लिए कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकते जिससे सामाजिक एकता टूटे। बसपा तो किसी भी जाति या वर्ग के बारे में कुछ भी कह सकती है। परंतु हम बोलेंगे तो पूरे देश के बारे में बोलेंगे।
अगर ऐसा तो पिफर सच्चर कमेटी का विरोध् क्यों?
हमारा मानना है कि देश में सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। देश का बंटवारा एक बार मजहबी आधर पर हो चुका है। अब दोबारा इस तरह का माहौल नहीं बनना चाहिए जिससे फिर मजहबी तौर पर अलगाव जैसी स्थिति दिखाई दे। इसलिए हम सच्चर के विरोध् में हैं।
सच्चर रिपोर्ट तो सिपर्फ पिछड़ेपन को दूर करने के लिए है।

हमारा यह कहना है किसी धर्म अथवा पंथ का कोई भी व्यक्ति अगर पिछड़ा है तो उसे आरक्षण मिलना चाहिए। मजहब के आधर पर नहीं होना चाहिए।
अगर एक मजहब में ज्यादा गरीबी है तो उसका क्या उपाय है?
मैं ऐसा नहीं मानता कि गरीबी केवल मुसलमानों में है। गरीबी तो हर मजहब और हर पंथ में है। इसलिए सबको समान व्यवहार से देखा जाना चाहिए।
पार्टी यह स्टैंड क्यों नहीं लेती कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर होना चाहिए?
दरअसल हमारे संविधन में ऐसी व्यवस्था है। हमारी पार्टी की यह नीति रही है कि अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों के अलावा जिन भी वर्गों में लोग गरीब हैं उन्हें सुविध मिलनी चाहिए।
अगर देश की सबसे पार्टी भाजपा है तो देश के मुसलमानों को वह अपने से क्यों नहीं जोड़ पाई?
ऐसा अभी नहीं हो पाया है। परंतु हमारी यह कोशिश रही है कि हम सबको यह बता पाएं कि हम सारे वर्गों के साथ हैं। भाजपा सबके साथ न्याय चाहती है, लेकिन हम हमेशा ही तुष्टीकरण के खिलापफ हैं।
क्या आपको नहीं लगता कि पार्टियां मुस्लिम नेताओं का इस्तेमाल तुष्टीकरण के लिए कर रही हैं?
बहुत सारी पार्टियां तुष्टीकरण की राजनीति करती हैं लेकिन भाजपा ऐसा कभी नहीं करती। हमारे यहां अगर कोई भी मुस्लिम लीडरशिप उभरी है तो वह स्वाभाविक रूप से उभरी है।
...लेकिन संवैधनिक तौर पर भारत सेकुलर देश है।
संविधन का जो हिंदी अनुवाद है उसमें सेुकलर शब्द का मतलब ध्र्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि ‘पंथनिरपेक्ष’ है। इसलिए मैं यह मांग कर रहा हूं कि ध्र्मनिरपेक्ष शब्द के प्रयोग पर पाबंदी लगनी चाहिए। आप तिरंगे झंडे को दखिए, उस पर जो चक्र है वह सारनाथ की खुदाई में मिला ध्र्मचक्र है। लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पीछे लिखा है, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के पीछे भी लिखा है। कैसे भारत ध्र्मनिरपेक्ष हो सकता है। सेकुलर शब्द जो बयालिसवें संशोधन में जोड़ा गया वह भी एक तुष्टीकरण भी था।
अगले चुनाव में प्रमुख मुद्दा क्या होगा?
आतंकवाद।
यह कैसे? आपके विदेश मंत्री तो आतंकवादियों को छोड़कर आए थे।
वह पफैसला सभी की सहमति से हुआ था। उस समय विमान में बैठे लोगों की जान बचाने के सिवाय कोई चारा हमारे पास नहीं था। वह मजबूरी में उठाया गया कदम था।
लेकिन आडवाणी जी ने अपनी किताब में कुछ और ही कहा है।
उन्होंने कुछ अलग नहीं कहा। उस पफैसले को नैतिकता के मापदंड पर नहीं तौला जा सकता। वह फैसला दबाव में लिया गया था।
क्या चुनाव में पार्टी इस पर जवाब दे पाएगी?
हम तैयार हैं और जनता को अपनी बात समझा लेंगे।
परमाणु करार का विरोध करके मध्य वर्ग की नाराजगी नहीं मोल ली है आपने?
हम अमेरिका के साथ किसी करार के विरोध् में नहीं है। हमारा विरोध् केवल इस बात पर है कि इससे हमारा परमाणु कार्यक्रम बाध्ति होगा।
महिला आरक्षण पर क्या कहेंगे?
हम हमेशा इसके पक्ष में है। संसदीय जगहों से पहले संगठनों में महिलाओं को उचित स्थान मिलना चाहिए।
पार्टी के अंदर लोकतंत्र की कमी है क्या?
नहीं बिल्कुल नहीं। हमारे जितना लोकतंत्रा है वह किसी भी पार्टी में नहीं है।
नेपाल के नए हालात के बारे में क्या कहेंगे?
वहां के हालात ठीक नहीं है। नेपाल को लेकर भारत सरकार का रवैया भी निराशाजनक रहा है।
क्या अगली सरकार वामपंथी दलों द्वारा नियंत्रित होगी?
नहीं। आज के हालात में यह संभव नहीं है। वामपंथियों की ताकत कम होने वाली है।
मुस्लिम उलेमाओं की ओर से आतंकवाद के खिलाफ जो पफतवा आया , उसके बारे में क्या राय है?स्वागत योग्य कदम है। इसको सराहा जाना चाहिए।
दिल्ली में मुख्यमंत्री कौन बनेगा?
यह पार्टी संसदीय बोर्ड और विधयकों द्वारा तय होगा।
लेकिन अरूण जेटली के रूप में एक प्रमुख नाम तो है आपके पास...।कोई भी फैसला पार्टी की संसदीय बोर्ड में लिया जाएगा।
राजनाथ सिंह प्रधनमंत्राी कब बनेंगे?
अभी तो आडवाणी जी को प्रधनमंत्री बनाना है;हंसते ।

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