सैयद अब्दुल रहमान गिलानी कश्मीरी अलगावादी खेमे में जानी-पहचानी आवाज हैं। संसद पर आतंकवादी हमले के षणयंत्र में इन पर भी कानूनी कार्रवाई की गई थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया था। कश्मीर में स्कूली शिक्षा और लखनऊ में काॅलेज श्क्षिा पाए गिलानी दिल्ली विश्वविदालय से अरबी में एम.ए., एम.फिल और पी.एच.डी. डिग्रियां की हासिल कीं। वर्तमान में दिल्ली के जाकिर हुसैन काॅलेज अरबी के एसोसिएट प्रोफेसर गिलानी से राज सरोकार के लिए अनवारुल हक और प्रसिद्ध नारायण शाही द्वारा कश्मीर के संदर्भ में की गई बातचीत की संपूर्ण प्रस्तुतिः
क्या कश्मीर मुद्दा हल होगा?
ऐसा लगता ही नहीं कि कश्मीर के मुद्दे का हल निकलने वाला है। जिस तरह से इस पर वार्ता हो रही है उससे तो लगता भी नहीं। इस मसले को हल करने के लिए तीन पार्टियां होनी चाहिए। यह कई बार कहा गया कि मसला हल हो चुका है, सिर्फ दस्तखत होने बाकी हैं। परंतु सारी बातें बकवास निकलीं। इस मसले को हल करने के लिए तीन पार्टियां होनी चाहिए- भारत, पाकिस्तान और कश्मीर। भारत और पाकिस्तान इसमें पार्टियां हैं क्योंकि दोनों के कब्जे में कश्मीर है। यह दोनों देशों के बीच जमीन के बंटवारे का मसला नहीं है। यह तो कश्मीरियों का मसला है।
आपके कहने का मतलब कि वार्ता गलत दिशा में है?
बिल्कुल। जब वार्ता में उस पक्ष को शामिल ही नहीं किया जा रहा है जिसके बारे पफैसला किया जाना है, जब उसको ही नहीं पूछा जाएगा तो पिफर कहां से इस वार्ता को सही माना जा सकता है? पहली बात यह मसला द्विपक्षीय नहीं है। अब तक जितने भी समझौते भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सारे के सारे द्विपक्षीय थे। हर बार ये दोनों देश आगे बढ़े, लेकिन पिफर पता चला कि मुद्दा वहीं का वहीं है। दोनों देशों के बीच कश्मीर एक अहम मसला है। यही बुनियादी मसला है। मेरा कहना है कि इस मसले को हल करने में कश्मीरियों की भी नुमांइदगी होनी चाहिए।
कश्मीरी नुमांइदगी तो बिखरी हुई है।
देखिए, कश्मीरी नुमांइदगी को पहचानना आसान नहीं है। आप कश्मीर में चुनाव कराएं। लेकिन चुनाव एसंबली के लिए नहीं बल्कि इस बात के लिए होना चाहिए कि कश्मीरियों को असल नुमांइदगी किसके पास है। ऐसे में इस तरह का चुनाव ही एक मात्रा रास्ता है।
क्या कश्मीर का भौगोलिक ढांचा इसके लिए तैयार है जब कि लाखों कश्मीरी पंडितों को वहां से भगा दिया गया है?
अगर इस तरह का पफैसला हो जाए तो मैं नहीं समझता के कोई कश्मीरी पंडितों को वोट देने से रोकेगा। किसी ने कभी भी यह नहीं कहा कि कश्मीरी पंडित वहां का हिस्सा नहीं हैं या उन्हें नहीं रहना चाहिए। उनको लेकर जो अनर्गल बातें होती हैं, सब बेबुनियाद हैं। मेरा कहना है कि कश्मीर के प्रतिनिध्त्वि को देखने के लिए एक चुनाव होना चाहिए जिसमें पंडित भी शामिल हों।
मौजूदा समय में कश्मीरियों का सही नुमाइंदा कौन है?
उस तरह से सर्वमान्य कोई नहीं है। लेकिन आज के समय में घाटी में गिलानी साहब ;सैयद अली शाह गिलानीद्ध सबसे बड़े नेता हैं। मीरवायज उमर पफारूख और यासीन मलिक भी हैं। इनको एक साथ रखकर कश्मीरियों का प्रतिनिध् िकहा जा सकता है।
नेशनल काॅन्Úेंस और पीडीपी क्या हैं?
दोनों कश्मीर की नहीं बल्कि दिल्ली की नुमांइदगी कश्मीर में करती हैं।
आपका मतलब कि वे भारत सरकार के एजेंट हैं?
जी बिल्कुल। यह किसी से छिपा नहीं है।
परंतु ये पार्टियां तो चुनाव जीतकर आती हैं।
कश्मीर में जितने चुनाव हुए हैं, कोई भी निष्पक्ष नहीं थे। इस बात को सभी जानते हैं। खुद आडवाणी जी अपनी किताब में इस बात को कह चुके हैं कि कश्मीर में कभी भी चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए।
अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दिए जाने के मामले से उठे विवाद पर क्या कहेंगे?
यात्रा आज से नहीं हो रही है। करीब डेढ़ सौ साल से चल रही है। जब घाटी में मिलेटेंसी चरम पर थी तब भी कभी किसी यात्राी को निशाना नहीं बनाया गया। यात्रा हमेशा होती रही है और कश्मीरियों ने उसका स्वागत किया और उसमें सहयोग भी किया। इस बार जो मसला उठा, यह तीन पार्टियों नेशनल काॅन्Úेंस, पीडीपी और कांग्रेस की वजह से हुआ। पीडीपी और कांग्रेस ने मिलकर जमीन दी और पिफर अलग अलग जुबान बोलते रहे और इतना बड़ा नुकसान हो गया।
जमीन देना गलत था कि देकर वापस लेना?
दोनों ही निर्णय गलत था। जमीन भी वोट लेने की राजनीति से दी गई। वापस भी इसी के तहत किया हैै।
लेकिन जमीन तो केवल दो महीने के लिए दी गई थी। क्या कहेंगे?
देखिए, पहले यात्रा 15 दिन के लिए होती थी। अब दो महीने के लिए हो रही है। कश्मीरियों को हक छीनने के लिए किया गया कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह मुद्दा राजनीतिक था ही नहीं, इसको बना दिया गया।
क्या घाटी से दहशतगर्दी खत्म कम होगी?
जो कुछ भी कश्मीर में हो रहा है या कहीं और हो रहा है, कोई कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्या है। लोगों को उनके अध्किार नहीं मिल रहे हैं तो उनको हथियार तक उठाना पड़ रहा है। लोगों को उनके अध्किार दे दीजिए, यह सब अपने आप खत्म हो जाएगा।
भारतीय कश्मीर में संघर्ष हो रहा है, लेकिन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में क्यों नहीं हो रहा है?
इसके अपने कारण हैं। पाकिस्तान सरकार ने अभी हाल में कहा कि कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा नहीं है। इसका मतलब है कि पाकिस्तान कश्मीरियों के बुनियादी हक को मानता है।
भारत का तो कहना है कि कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है।
नेहरू जी ने कहा था कि ‘कश्मीर अभिन्न हिस्सा नहीं है। अगर कश्मीरी यह पफैसला करते हैं कि वे भारत के साथ नहीं रहेंगे तो हमें दुख तो जरूर होगा लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते।’ दूसरी तरपफ भारतीय संसद 1994 में एक प्रस्ताव पारित करके कहती है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। अब आप समझ सकते हैं कि भारत की इस मसले पर पोजीशन क्या है।
इस मसले को सुलझाने में अमेरिका की क्या भूमिका देखते हैं?
मेरा मानना है कि भारत और पाकिस्तान अगर इस पर गंभीर हो जाएं तो इसके मसले पर अमेरिका की कोई जरूरत नहीं है।
क्या कश्मीर से सेना हटनी चाहिए?
जब कश्मीर में सेना भेजी गई तो कहा गया कि सेना कश्मीरियों की मदद के लिए भेजी जा रही है। जिस दिन कश्मीरी चाहेंगे सेना घाटी छोड़ देगी। लेकिन आज क्या हो रहा है। सरकार वहां से सेना हटाने का नाम नहीं ले रही है।
कश्मीरियों को पहले आजादी चाहिए या कि विकास?
सबसे पहले कश्मीरियों को आजादी चाहिए।
क्या कश्मीर भारत का हिस्सा है?
नहीं। कश्मीर न भारत का हिस्सा है, न पाकिस्तान का। कश्मीरियों को दोनों से आजादी चाहिए।
क्या कश्मीर मुस्लिम प्रश्न है?
नहीं। इसको इस तरह से नहीं देखा जाना चाहिए। कश्मीर एक सियासी मसला है। कुछ लोग इस तरह की साजिश कर रहे हैं कि यह मसला कश्मीर का न होकर मुस्लिम मुद्दा होकर रह जाए।
कश्मीरी के अलगाववादी क्यों नहीं पंडितों को अपने साथ लाते?
ऐसा होना चाहिए और मुझे उम्मीद है कि आगे चलक ऐसा हमें देखने को मिलेगा।
आपका प्रिय भारतीय प्रधनमंत्राी कौन रहा है?
कश्मीर के नजरिए से सभी लोगों ने बातें की। पंडित नेहरू की बातों से लगता है कि वह कुछ बेहतर जरूर चाहते।
कौन ज्यादा गंभीर लगता है, भारत या पाकिस्तान?
दोनों गंभीर नहीं लगते। दोनों इस मसले को लटकाए रखना चाहते हैं।
कश्मीर मसला कब हल होगा?
अभी तो कुछ दिखता नहीं। अगर सारे पक्ष गंभीर हो जाए तो इसका हल जल्द हो सकता है।
शुक्रवार, 8 अगस्त 2008
‘कश्मीर को पहले आजादी चाहिए’
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1 टिप्पणी:
जम्मू और कश्मीर में आज जो हालात बने हैं उसकी एकमात्र और सिर्फ एकमात्र वजह हमारे देश के नेता (जिन्हें हम माननीय, परम पूज्य, अन्नदाता भी कह सकते हैं) और केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा साठ वर्षों से किया जा रहा मुस्लिम तुष्टिकरण है। जिनकी मुस्लिम तुष्टिकरण और अलगाववादी नीतियों के कारण आज जम्मू और कश्मीर एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां कोई समाधान होता नहीं दिखता। हमारे देश के कुछ मुस्लिम नेताओं ने पिछले काफी लंबे समय से जम्मू और कश्मीर की मुस्लिम जनता को इस कदर भारत के विरोध में खड़ा कर दिया है कि आज वो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद, हिन्दुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे हैं। ये लोग जिस तरह से भारत में रहकर, भारत का ही खाकर, भारत का ही पहनकर तथा भारतीय दयादृष्टि के पात्र बनकर, बल्कि ये कहना ही उचित होगा कि भारत के ही टुकड़ों पर पलकर, भारत को ही तोड़ने पर आमादा हैं, आजाद होने पर आमादा हैं, अलग राष्ट्र बनाने पर आमादा हैं, तो क्या ये सही कर रहे हैं? क्या हमें इनका कहा मान लेना चाहिए? जैसा कि हम आज तक करते आ रहे हैं? क्या श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन नहीं देनी चाहिए?
नहीं ये बिल्कुल भी सही नहीं है और श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीन के टुकड़े को लेकर जो विवाद हो रहा है वो बिल्कुल ही सही दिशा में है, क्योंकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है और अगर अब थोड़ी और देर हुई तो शायद कश्मीर भी पाकिस्तान, तिब्बत, म्यांमार और अफगानिस्तान की तरह ही भारत का हिस्सा न रहे।
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