गुरुवार, 7 अगस्त 2008

जमियत के महासचिव मदनी से बातचीत

‘मुसलमान साजिश का शिकार हुए हैं’आज देश ही नहीं, पूरी दुनिया में मुसलमानों को शक की नजर से देखा जाता है। भारत में आजादी के साठ साल बाद भी मुसलमानों को मुख्यधरा से अलग करके देखा जाता है तो इसमें दोष मुस्लिम समुदाय का भी है। लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार वे रहनुमा हैं जो उनकी लीडरशिप का दावा पिछले साठ वर्षों से कर रहे हैं। इसी मुद्दे पर राज सरोकार संवाददाता अनवारूल हक ने जमियत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव और राज्यसभा सांसद मौलाना महमूद असद मदनी से बातचीत की। पेश हैं उसके प्रमुख अंश -
क्या आप मानते हैं कि देश का मुसलमान मुख्यधरा से अलग है?देखिए, ऐसी सोच फैला दी गई है कि मुसलमान मुख्यधारा से अलग है। अगर ऐसा है भी तो इसके लिए मुसलमान दोषी नहीं हैं बल्कि वे लोग दोषी हैं जो मुसलमानों की तरक्की को पसंद नहीं करते। उन्होंने इस तरह के विचार को बढ़ाने का काम किया। आज इसका नतीजा सबके सामने है।मुसलमानों के मुख्यधारा से अलग होने की वजह क्या है?इसका जवाब बहुत बड़ा है। देश की आजादी के समय कुछ लोग खड़े हुए जिन्होंने मजहब के नाम पर देश के विभाजन की मांग की। जिन लोगों ने देश का विभाजन करवाया था, चाहे वे भारत के रहनुमा हों या पिफर मुस्लिम लीग के लोग हों, उनका तो कुछ नहीं बिगड़ा। लेकिन इस पूरे एपीसोड का जिम्मेदार मुसलमानों को करार दिया गया या कहें कि उनके ऊपर यह आरोप मढ़ दिया गया। मुसलमानों को मुख्यधरा से अलग रखने का सिलसिला भी उसी वक्त शुरू हुआ था और यह सियासी मकसद के लिए किया गया था।इसका मतलब कि मुसलमानों का इस्तेमाल किया गया है।जी, बिल्कुल। देखिए मुसलमानों को शिक्षा से दूर रखा गया। उनको बुनियादी सुविधओं से भी दूर रखा गया। इसी का नतीजा रहा कि मुसलमान पिछड़ता चला गया। इसका मतलब यह कि मुसलमानों को अब तक सिपर्फ इस्तेमाल ही किया गया है।इसका कसूरवार किसे कहेंगे?इसके लिए कसूरवार वही लोग हैं जिनकी देश में हुकूमतें रही हैं। उन्होंने ही मुसलमानों को इस हाल में पहुंचाया है। ऐसी सूरत पैदा कर दी कि हिंदुओं के जो मसले हैं उससे मुसलमान को कोई मतलब न हो और मुसलमानों के जो मसले थे उससे हिंदू बेखबर हो जाए। दोनों को अलग कर दिया गया और आज हालत सबके सामने है।न्यूक्लियर डील को मुसलमानों के साथ क्यों जोड़ दिया गया?मैं इसे गलत मानता हूं। हमने बार-बार यह बात कही है कि न्यूक्लियर डील को मुसलमानों से जोड़ना गलत है। यह मसला मुसलमानों का नहीं है, बल्कि यह तो पूरे देश का मसला है। अगर देश की सरकार या कहें कि सत्ता में बैठे लोग यह सोचते हैं कि न्यूक्लियर डील देश के लिए पफायदेमंद है तो मेरा मानना है कि यह मुसलमानों के भी हित में है।मुसलमानों का एक तबका तो इस डील का विरोध् कर रहा है।इस विरोध् को मजहबी नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। मुसलमानों में कुछ लोग हैं जो इस डील का विरोध् कर रहे हैं तो कुछ लोग इसका समर्थन भी कर रहे हैं। मैं यह बता दूं कि वे लोग इस डील का विरोध् या समर्थन मुसलमान की हैसियत से नहीं कर रहे हैं बल्कि एक भारतीय की हैसियत से कर रहे हैं। आप देखिए कि दूसरे समुदाय में भी इस डील को लेकर कहीं विरोध् है तो कहीं समर्थन है। इसलिए इसको देश की नजर से देखा जाना चाहिए न कि मजहब की नजर से।क्या अमेरिका के साथ इस तरह का समझौता होना चाहिए?अगर देश को चला रहे लोग समझते हैं कि यह डील देश हित में है तो हमें भी वहीं मानना है। वैसे भी अगर यह डील होती है तो एनएसजी में जो सभी 45 देश हैं, उन सभी से भारत को न्यूक्लियर एनर्जी मिल सकेगी। इसलिए बात केवल अमेरिका की नहीं है। सबसे बड़ी यह डील देश के भले के लिए की जा रही है।क्या आप खुद इस डील के पक्ष में हैं?अगर यह देश हित में है तो मैं इसके पक्ष में जरूर हूं।अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील या ईरान के साथ गैस पाइपलाईन, दोनों में से कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है?अगर दोनों से देश का भला होता है तो दोनों महत्वपूर्ण है। अमेरिका के साथ समझौते से हमें न्यूक्लियर एनर्जी मिलेगी तो वहीं ईरान के साथ समझौते से गैस प्राप्त होगी। देश की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए दोनों अहम हंै।कहीं भी कुछ आतंकवादी घटना होती है तो सबसे पहले मुसलमानों पर शक किया जाता है। ऐसा क्यों?ऐसा हो रहा है और यह बिल्कुल गलत है। मुसलमानों को बेवजह शक की नजर से देखा जा रहा है, जबकि मुसलमान अमनपसंद है। मैं मानता हूं कि देश का मुसलमान आतंकवाद का पक्षध्र कभी नहीं हो सकता। आतंकवाद को इस्लाम से बेवजह जोड़ा जाता है। इस्लाम का जन्म ही जुल्म और दहशतगर्दी के खात्मे के लिए हुआ है। पिफर इस्लाम को दहशतगर्दी से कैसे जोड़ा जा सकता है? असल में मुसलमान सजिश का शिकार हुआ है।एक राज्य के मुख्यमंत्री तो यहां तक कहते हैं कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान होता है। इस पर क्या कहेंगे आप?मैं समझ रहा हूं आप किसकी बात कर रहे हैं। मेरी समझ से वह मुख्यमंत्राी बावला हो गया है। हर आतंकवादी मुसलमान नहीं है।लेकिन आतंकवादी गतिविधियों में पकड़े जाने वाले सारे लोग मुसलमान ही होते हैं।ऐसी बात बिल्कुल नहीं है। देश के उत्तर-पूर्व में जो भी आतंकी घटनाएं होती हैं, उनमें 80 पफीसदी से ज्यादा गिरफ्रतारी गैरमुस्लिमों की होती है। नक्सल गतिविध्यिों में भी शामिल होने वाले ज्यादातर लोग मुसलमान नहीं होते। क्या नक्सल और देश के उत्तर-पूर्व में चल रही हिंसा आतंकवाद नहीं है? ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं? यह बात सिपर्फ मुसलमानों को बदनाम करने के लिए की जाती है।इन मसलों से हटकर सामाजिक मुद्दों की बात करें तो क्या अभी मुसलमानों में बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं है?बिल्कुल, सामाजिक स्तर पर अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। इसकी कोशिशें हो भी रही हैं, लेकिन कुछ हालात ऐसे रहे कि मुसलमान सामाजिक तौर पर उतना मजबूत नहीं हो सके जितना होना चाहिए था।मुस्लिम महिलाओें की हालत तो कहीं ज्यादा खराब है।ऐसा है। मेरा मानना है कि अभी सोशल रिपफाॅर्म की बहुत जरूरत है। इसके बाद ही महिलाओं और सबकी स्थिति में सुधर हो सकता है।मुसलमान वोट बैंक के रूप में कब तक इस्तेमाल होते रहेंगे?यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के मुसलमान आजादी के 60 साल बाद तक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा इसलिए हुआ कि उनको गुमराह किया गया और गुमराह उन लोगों ने ज्यादा किया जो सत्ता में थे। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सिलसिला अब बंद होगा।

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