शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

राजा-रानी बने कहानी

अनवारूल हक
नेपाल में राजवंश को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। यही कारण है कि राजवंश से जुड़े किसी भी राजा का आदेश नेपाल की जनता के लिए ईश्वरीय आदेश होता था। परंतु वंश के ग्यारहवीं पीढ़ी की तकदीर जिसके सहारे थी, वह भगवान न बन सका। उसे मंदिर रूपी नारायणहिती महल से किसी बेसहारा और लाचार इंसान की तरह बाहर जाते हुए देखा गया। नेपाली जनता ने इस मंजर को दिल पर पत्थर रखकर देखा और स्वीकार कर लिया। उन्हें बाबा गोरखनाथ की वह भविष्यवाणी भी याद आई, जिसमें उन्होंने नेपाल नरेश को श्राप देते हुए कहा था कि उनका राजवंश ग्यारहवीं पीढ़ी के बाद खत्म हो जाएगा। अब इसे पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की बदकिस्मती कहें या पिफर कुछ और कि वे ही ग्यारहवीं पीढ़ी के खेवनहार थे। ज्ञानेंद्र और उनका पूरा परिवार नेपाल की जनता की तकदीर का पफैसला करते करते अब अपनी तकदीर को सुधरने की कवायद में लग गया है। परंतु अब न तो सिंहासन है और न ही जन्नतनुमा महल।ज्ञानेंद्र अगर अपने महल से बेदखल हुए हैं तो उसमें अहम भूमिका माओवादियों की रही है। इस बात से कोई इनकार भी नहीं कर सकता। परंतु एक संशय सबके मन में है कि राजा के बाद अब नई सरकार नेपाल की आम जनता के लिए कितना कल्याण्कारी और सुकून देने वाली होगी? सियासी जानकार कहते हैं कि अगर नेपाल में नए सत्ताधरी राजशाही का पूरा स्मरण नेपाली जनता के मन से तभी दूर कर सकते हैं, जब वे उन्हें एक शुचितापूर्ण और विकासपरक शासनव्यवस्था देने में कामयाब हो पाएंगे। ज्यादातर नेपाली जनता के मन को यही बात कचोट रही है कि सैकड़ों साल से राजशाही के प्रति चले आए उनके विश्वास को राजवंश के ही एक राजा ने चकनाचूर कर दिया और अब जिन लोगों के पास उनके भाग्य की कुंडली जा रही है, उनके हाथ भी हजारों लोगों के खून से लाल हैं। ज्ञानेंद्र ने जब अपने भाई बीरेंद्र और उनके पूरे परिवार की मौत के बाद सिंहासन संभाला तो सोचा भी नहीं होगा कि इस अपमानजनक ढंग से उनको अपने राजपाठ से विदाई लेनी पड़ेगी। वर्ष 2001 से पहले नेपाल को छोड़ दुनिया के ज्यादातर लोग ज्ञानेंद्र और उनके नाम से अनजान थे। नेपाल की जनता भी उस वक्त अपने चहेते राजा बीरेंद्र के प्रेम और सम्मान में इस कदर नतमस्क थी कि उसे ज्ञानेंद्र को याद करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। परंतु एक जून 2001 की रात नेपाल के तत्कालीन राजा बीरेंद्र और उनकी प्रजा के लिए काली रही। पर ज्ञानेंद्र के लिए अपने भाई की मौत की एवज में एक साम्राज्य हाथ लग गया, जहां उन्हें अपनी महिमा और रसूख का डंका पीटने की पूरी आजादी थी। यह बात अलग है कि नरेश बीरेंद्र और उनके परिवार की हत्या की आरोप की कुछ छींटे उनकी ओर भी आईं। परंतु इस पर कुछ खुलकर सामने नहीं आ सका क्योंकि खुद वही पूरे निजाम के रखवाले थे। गौर करने वाली बात यह है कि ज्ञानेंद्र पहली बार राजा नहीं बने थे, बल्कि नेपाल का राजसिंहासन उनको उस उम्र में नसीब हो गया था जब उनको अपने माता-पिता के सिवाय किसी दूसरे की पहचान नहीं थी। दरअसल सन् 1950 में तत्कालीन प्रधनमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा और उनके दादा राजा त्रिभुवन के बीच तनाव इस स्तर तक बढ़ गया कि वे अपने बेटे और पोते यानी बीरेंद्र के साथ भारत चले आए। लेकिन उस दौरान तीन वर्षीय ज्ञानेंद्र वहीं रहे और राणा ने उनको खाली पड़ी राजगद्दी पर बैठा दिया। यह अलग बात है कि उस नन्हीं उम्र में वह नेपाल के राजशी सिंहासन पर केवल एक साल तक रह सके।बाद में राणा का राज नेपाली जनता के विरोध् के आगे ज्यादा चल न सका और पूरी सत्ता ज्ञानेंद्र के परिवार के हाथों में आ गई। परंतु ज्ञानेंद्र को दोबारा राजगद्दी पूरे पचास साल बाद नसीब हुई और वह भी तब जब वह खुद की और अपने बिगड़ैल बेटे पारस की करतूतों की वजह से बदनामी की चादर में लिपट चुके थे। उनके पहले राजा बीरेंद्र की छवि किसी देवता से कम नहीं थी। इसकी वजह यह थी कि वे नेपाली जनता की तरक्की के हर रास्ते की स्वीकार करते थे, चाहे वह रास्ता सत्ता पर उनकी पकड़ को कमजोर ही क्यों न कर रहा हो। जब बीरेंद्र के हाथों में नेपाल की कमान थी तब माओवादी अपनी हिंसक मंसूबों के बावजूद नेपाली आवाम का वह यकीन नहीं जीत पाए थे जो उन्होंने ज्ञानेंद्र के समय थोड़ी सी मसक्कत में प्राप्त कर लिया।कहने का मलब सापफ है कि मौजूदा समय में अपने और खानदान की बदतरी के लिए ज्ञानेंद्र की कारगुजारियां ही जिम्मेदार हैं। वे कहीं अध्कि चालाक बनने की कोशिश में भारत जैसे विशाल पड़ोसी देश के साथ भी ध्ूर्तता का परिचय देने लगे और चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाने लगे। महत्वपूर्ण है कि इस वंश का नाता भारत से पुराना है। इस वंश के पुरोध पृथ्वी नारायण शाह खुद उस समय भारत में स्थित गोरखा रियासत के राजा थे। सन् 1768 में उन्होंने काठमांडू राज्य का गठन किया जो बाद में नेपाल का शक्ल ले लिया। उसके बाद बीसवीं सदी में नेपाल कुछ सालों तक राणा परिवार के हाथों में संचालित हुआ लेकिन पिफर इसी शाह परिवार के हाथों में बागडोर आ गई। इतनी समृ( विरासत और भारत से निकटता के बावजूद ज्ञानेंद्र और उनके युवराज पारस ने वह सब कुछ किया जो उनके पूर्वजों ने कभी सोचा न था। उन्होंने राजशाही की सबसे बड़ी ताकत नेपाली जनता जनता के अटूट विश्वास को तार-तार कर दिया। हालत यहां तक आ गई कि उनके कदमों में अपना माथा टेकने वाले उन्हें रास्ता दिखाने लगे। अब खुद ज्ञानेंद्र पश्चाताप और सुधर के समंदर में डुबकी लगा लंे तो भी महल की ओर उनके लिए रास्ता बनाना असंभव सा लगता है।
सच हुई भविष्यवाणी
नेपाल के राजा वीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या की हत्या कथित तौर ;ज्ञानेंद्र के कथन के बतौरद्ध उनके ही पुत्रा के हाथों हुई। इस बात को स्वीकार करना नेपाली जनमानस के लिए कठिन था क्योंकि नेपाली जनमानस में ज्ञानेंद्र को ही दीपेंद्र सहित पूरे परिवार का हत्यारा मान लिया गया है, जो ठीक भी है।लेकिन यह भविष्यवाणी 230 साल पहले ही हो चुकी थी। यह भविष्यवाणी गोरखाओं के कुलगुरू गोरखनाथ ने की थी। नेपाल में यह किवदंती पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से आम जनता के बीच चर्चा का विषय रही है। नेपाल के इतिहास पर लेखक आदित्य मान श्रेष्ठ ने अपनी पुस्तक ‘ड्रेडपफुल नाइट-कारनेज ऐट नेपालीज रायल पैलेस’ ;एकता बुक्स, काठमांडो, नेपाल, 2001, पृष्ठ 92द्ध तथा प्रोपफेसर राजनाथ पांडेय ;ज्ञानपीठ प्राइवेट लिमिटेड, पटना, 1964, पृष्ठ परिशिष्ट क 86द्ध ने अपनी पुस्तक ‘नेपाल और नेपाल नरेश’ में इस किवदंती का जिक्र भी किया है। किवदंती के अनुसार पृथ्वी नारायण शाह उस वक्त आयु में छोटे थे। एक दिन गोरखाओं के कुलगुरू बाबा गोरखनाथ अपनी गुपफा से निकल कर उनके पास आए। बाबा गोरखनाथ ने प्रसाद के रूप में अपने मुंह से दही निकालकर पृथ्वी नारायण शाह के हाथों में रखा। लेकिन बालक पृथ्वी नारायण शाह ने उस प्रसाद को पफंेक दिया। पफेंका गया प्रसाद बालक पृथ्वी नारायण के पैरों की दस अंगुलियों पर गिरा। यह देखकर बाबा गोरखनाथ क्रोध्ति हो गए और उन्होंने पृथ्वी नारायण शाह को श्राप दिया कि उनके दस पीढ़ी बाद यानी ग्यारहवीं पीढ़ी में उनका वंश की सत्ता खत्म हो जाएगी। यह भविष्यवाणी अब सही साबित हुई है। महाराजा दीपेंद्र शाह इस वंशावली में ग्यारहवीं पीढ़ी हैं। नेपाली जनमानस ने ज्ञानेंद्र को बतौर महाराज कभी नहीं स्वीकार किया, बल्कि उनके खिलापफ विद्रोह का झंडा उठा लिया।

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