शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

डील का फाइनल दौर

वियना में न तो पाकिस्तान का ईष्र्यालु विरोध काम आया और न ही हमारे देश में इस ऐतिहासिक डील के खिलापफ झंडा बुलंद करने वाले कुछ लोगों की बददुआएं। वहां तो केवल भारत की कूटिनीतिक और सामरिक समृधि का बखान हुआ और सर्वसम्म्ति से ऐटमी डील के मसौदे का हरी झंडी दे दी गई। कहने का मतलब सापफ है कि भारत-अमेरिका ऐटमी डील अब अपने आखिरी और बेहद निर्णायक पड़ाव में पहुंच चुकी है। आगामी 21 अगस्त को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी में इस डील को जाना है और इसके बाद ही दुनिया 45 ताकतवर देश इस पर अपना फैसला देंगे। लेकिन भारत और अमेरिका दोनों निश्चिंत हैं कि इस डील को एनएसजी में भी कामयाबी मिलकर रहेगी।दोनों देशों के इस दावे कि यह डील एनएसजी में पास हो जाएगी, बावजूद इसके अभी भी ज्यादा नहीं तो थोड़ा मुश्किलें जरूर हैं। लेकिन उन मुश्किलों को झेलने का काम भारत से ज्यादा अमेरिका को ही करना है। एनएसजी में सबसे बड़ा खतरा चीन हो सकता है। हालांकि इस पर भारत आशंका जाहिर करते हुए यह कहता रहा है कि चीन से उसे समर्थन मिलेगा। परंतु भारत की इस बात में सौ पफीसदी दम नहीं है। दरअसल, अमेरिका अपने वर्चस्व के बल पर दुनिया के और देशों को अपने फेवर में कर सकता, लेकिन यह सच्चाई है चीन आसानी से उसके बात को नहीं मानने वाला है। चीन को मनाने के लिए अमेरिका को अतिरिक्त उर्जा खर्च करनी पड़ेगी। गौर करने वाली बात है कि एनएसजी में हर सदस्य देश के पास वीटो का अध्किार है और इसी बात का डर है कि कहीं चीन इस डील परन वीटो ना कर दे। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका और भारत दोनों के समक्ष एक तरह का झमेला जरूर खड़ा हो जाएगा। चीन के अलावा पाकिस्तान ऐमात्रा रहा है जो चीन से कहीं ज्यादा इस डील का दबी जुबान में विरोध् करता रहा हैै। परंतु सुकून की बात है कि पाकिस्तान का एनएसजी से कोई वास्ता नहीं है और उसका इतना बड़ा कद भी नहीं है कि वह डील के खेल को अब बिगाड़ सके। ज्ञात रहे कि आईएईए में डील का मसौदा पेश हुआ था तो पाकिस्तान ने इसके विरोध् में खेमेबंदी प्रारंभ कर दी थी।लेकिन उसकी यह खेमेबंदी काम न आ सकी और साथ ही उसको अमेरिका की नाराजगी भी ढेलनी पड़ी। दूसरी ओर फ्रांस और आस्टेलिया जैसे देश भी पहले जो थोड़ा-बहुत असंतुष्ट नजर आ रहे थे, लेकिन उनको अमेरिका अपने साथ लाने में कामयाब रहा।इध्र, भारत सरकार इस डील पर अपनी सारी ताकत झोंक देना चाहती है। प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह और उनकी पूरी मशीनरी ऐसी कोई खामी नहीं छोड़ना चाहते जिससे इस डील के रास्ते में किसी भी तरह का प्रतिरोध खड़ा नजर आए। वहीं अपने कार्यकाल के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके अमेरिकी राष्टपति बुश ने अपनी पूरी फौज को इस डील के लिए कवच के रूप में खड़ा कर दिया है। विदेश मंत्राी कोंडलिसा राइस तो अंतर्रास्टीय स्तर पर इस डील के समर्थन में गोलबंदी करने का जिम्मा संभाले हुए हैं।अगस्त का महीना इस डील के लिए बेहद अहम होने जा रहा है। अब डील का पफाइनल दौर शुरू हो चुका है। अमेरिका और भारत की तैयारियां भी इसी के नजरिये से चल रही है। एनएसजी से पास होने के बाद इस पर आखिरी मुहर के लिए अमेरिकी कांग्रेस से लगनी होगी। उसको लेकर तो शायद ही कोई मुश्किल पेश आए। कहने का मतलब कि एनएसजी इस डील के लिए सबसे अहम और महत्वपूर्ण पड़ाव है।

कोई टिप्पणी नहीं: