अनवर
लोगों को इस बात को समझना चाहिए की देश में स्थिरता की सख्त जरूरत है । नहीं तो हम केवल चीन के सफलताओं की तरीफ ही करते रह जायेंगे। जम्मू और कश्मीर में उठे विवाद से साफ हो गया की हमने साथ वर्षों के इस लोकतंत्र के प्रति अपनी जिमीदारियों को नहीं समाज सके। पूरी दुनिया आज मजाक के नजरिये से देख रही है। इसकी वजह केवल इतनी है की हमने बेहद दुखद राजनितिक मूर्खता का परिचय दिया है। अब तो हमें लगता है की हम लोगो को जार्जिया से थोडी बहुत सीख लेनी चाहिए जिसने बड़ी साम्यवादी ताकत रूस से लोहा लेने के बाद भी कूटनीतिक ढंग ले साउथ अस्सोतिया पर अपना रूख बरक़रार रख सका। जार्जिया की जगह भारत रहता तो क्या होता? जरा सोचिये की वहां की जनता ने कोई ऐसा कदम उठाया था जिससे जार्जिया की सरकार को कोई संकट का सामना करना पड़े ।
दरअसल इसमे दोष किसी को नहीं दिया जा सकता क्योकि हम भारत्या बेहद भाऊक हैं और आस्था रखने वाली चीजों पर सियासत करने से गुरेज नहीं करते। कहने का मतलब की दहर्म की आस्था अपने देश की आस्था से कहीं आगे निकल जाती है। ऐसा होने पर परिणाम केवल विघटन होता है। कोई मने या न मने मजहब के आवरण में जितने भी विवाद हुए उसमे सिवाय भारत के कलंकित होने से कुछ नहीं निकला। साथ ही जो लो इस देश को तोड़ना चाहते है वे ही मजबूत हो गए। मजहब के खेत में राजनीती की फसल उगने से नतीजा सिर्फ विनास है और अपने देश तार्राकी के मामले में वर्षों पीछे चला जाता है।कलम साहब उन लोगो के सपनो का क्या होगा जिसकी ताबीर भारत को विकसित करने की है। जब तक लोग इस बात को नहीं समझेंगे की धर्म व्यक्तिगत और सामाजिक धारा के दायरे में आता है , न की राष्ट्रया धारा के दायरे में, तब तक ऐसे ही देश पर आए संकट को दूर नहीं किया जा सकेगा। हम तो हर हल में कहते हैं की देश किसी मजहब पहले आता है और किसी भी मजहब से ज्यादा अहमियत रखता है।
