सोमवार, 25 अगस्त 2008

जार्जिया से सीखें हम लोग

अनवर

लोगों को इस बात को समझना चाहिए की देश में स्थिरता की सख्त जरूरत है । नहीं तो हम केवल चीन के सफलताओं की तरीफ ही करते रह जायेंगे। जम्मू और कश्मीर में उठे विवाद से साफ हो गया की हमने साथ वर्षों के इस लोकतंत्र के प्रति अपनी जिमीदारियों को नहीं समाज सके। पूरी दुनिया आज मजाक के नजरिये से देख रही है। इसकी वजह केवल इतनी है की हमने बेहद दुखद राजनितिक मूर्खता का परिचय दिया है। अब तो हमें लगता है की हम लोगो को जार्जिया से थोडी बहुत सीख लेनी चाहिए जिसने बड़ी साम्यवादी ताकत रूस से लोहा लेने के बाद भी कूटनीतिक ढंग ले साउथ अस्सोतिया पर अपना रूख बरक़रार रख सका। जार्जिया की जगह भारत रहता तो क्या होता? जरा सोचिये की वहां की जनता ने कोई ऐसा कदम उठाया था जिससे जार्जिया की सरकार को कोई संकट का सामना करना पड़े ।

दरअसल इसमे दोष किसी को नहीं दिया जा सकता क्योकि हम भारत्या बेहद भाऊक हैं और आस्था रखने वाली चीजों पर सियासत करने से गुरेज नहीं करते। कहने का मतलब की दहर्म की आस्था अपने देश की आस्था से कहीं आगे निकल जाती है। ऐसा होने पर परिणाम केवल विघटन होता है। कोई मने या न मने मजहब के आवरण में जितने भी विवाद हुए उसमे सिवाय भारत के कलंकित होने से कुछ नहीं निकला। साथ ही जो लो इस देश को तोड़ना चाहते है वे ही मजबूत हो गए। मजहब के खेत में राजनीती की फसल उगने से नतीजा सिर्फ विनास है और अपने देश तार्राकी के मामले में वर्षों पीछे चला जाता है।कलम साहब उन लोगो के सपनो का क्या होगा जिसकी ताबीर भारत को विकसित करने की है। जब तक लोग इस बात को नहीं समझेंगे की धर्म व्यक्तिगत और सामाजिक धारा के दायरे में आता है , न की राष्ट्रया धारा के दायरे में, तब तक ऐसे ही देश पर आए संकट को दूर नहीं किया जा सकेगा। हम तो हर हल में कहते हैं की देश किसी मजहब पहले आता है और किसी भी मजहब से ज्यादा अहमियत रखता है।

रविवार, 10 अगस्त 2008

अभिनव तुझे सलाम

वाह अभिनव बिंद्रा । हम सबको तुम पर नाज है। ओलंपिक में गोल्ड मैडल दिलाने के लिए हम सारे भारतीयो की तरफ से ढेर सारी बधाई।

.राजनाथ सिंह का साक्षात्कार

.सूर्यकान्त बाली के साथ अनवारूल हकपीएन शाही
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में दावा किया था कि भाजपा आज देश की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। ‘देश की सबसे बड़ी पार्टी कौन’, इस विषय पर अपन पत्रिका के इस अंक की आवरण कथा लिखने के अवसर पर भाजपा अध्यक्ष से इस पर बातचीन होना स्वाभाविक ही था। राज सरोकार टीम जब भापजा अध्यक्ष से बातचीत करने उनके दिल्ली आवास पर गई तो इस मुख्य विषय के साथ साथ अन्य जिन विषयों पर उनसे संवाद हुआ , वही संवाद पाठकों के लिए अविकल रूप से प्रस्तुत है:
क्या देश के 12 राज्यों में सत्तासीन होने को आधार बनाकर आपने कहा है कि भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है?
केवल इसी आधार पर मैंने यह दावा नहीं किया कि भाजपा सबसे बड़ा दल है। अगर आप विश्लेषण करेंगे तो पता चलेगा कि जिन राज्यों में हमारी पार्टी की सरकारें हैं, वहां कुल 200 से अधिक लोकसभा क्षेत्रा आते हैं। वहीं कांगे्रस की जहां सरकारें है वहां यह आंकड़ा 150 से भी कम होगा। यही नहीं अब तो हमने कर्नाटक के साथ दक्षिण भारत में प्रवेश कर लिया है। इसका मतलब यह कि हमारी पार्टी अब संपूर्ण भारत की पार्टी है और सबसे बड़ी पार्टी भी है।
पार्टी की इस सफलता को आप कैसे आंकते हैं?
स्वतंत्रा भारत में यह पहली बार हुआ है कि कोई दल कांग्रेस से आगे निकलने में कामयाब रहा है। अब हम सांगठनिक और भौगोलिक दोनों तरह से कांग्रेस या किसी भी अन्य राजनीतिक दल से आगे निकल चुके हैं। निश्चित तौर पर यह पार्टी के लिए बहुत बड़ी सपफलता है। मौजूदा समय में देश के 65 प्रतिशत मतदान केंद्रों पर हमारी पहुंच है। इसे और भी ज्यादा बढ़ाने के लिए मैं अपने कार्यकर्ताओं से अपील कर चुका हूं। मुझे विश्वास है कि पार्टी अभी और आगे बढ़ेगी।
कांग्रेस का आरोप है कि कर्नाटक में आपको धुप्पल में ही सपफलता मिली है।
देखिए, मेरे इस दावे को कि भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है, कांग्रेस भी इसको गलत बताने का साहस नहीं दिखा पाई क्योंकि यह सच्चाई है। कर्नाटक में जनता ने कांग्रेस और जे डी;एसद्ध दोनों को नकार दिया और भाजपा में अपना विश्वास जताया है। येदियुरप्पा के नेतृत्व को भी कर्नाटक की जनता ने स्वीकार किया है।
कर्नाटक के बाद क्या भाजपा पूरे दक्षिण भारत मंें इसी तरह का कारनामा दोहरा पाएगी?
कर्नाटक ने हमारे लिए दक्षिण में एक द्वार खोलने का काम किया है। मैं इतना निश्चित तौर से कह सकता हूं कि दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में फिलहाल हमारी सरकार भले ही न बने परंतु हम अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में सपफल होंगे। लोगों का पार्टी में विश्वास बढ़ा है। पहले इसे उत्तर की पार्टी कहा जाता था। फिर पूरब की पार्टी बनी। इसके बाद भाजपा पूरे उत्तर भारत की पार्टी बनी। अब पार्टी जब दक्षिण भारत में सत्तासीन हुई है तो इसे अखिल भारतीय पार्टी ही मानी जाएगी।
वह राज्य, जहां पार्टी कभी नंबर एक की पोजीशन पर थी, आज वहां हालत खराब है। इसके बारे में क्या कहेंगे?
मुझे पता है कि आप उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं। वहां हमने सरकार भी चलाई और कई सफलताएं पाईं। लेकिन पिफलहाल पार्टी की हालत प्रदेश में पहले जैसी नहीं है। हमें उम्मीद है कि वहां एक बार पिफर पार्टी पहले वाली स्थिति में आएगी।
उत्तर प्रदेश में पार्टी क्यों इतनी बुरी स्थिति में पहंुची ?
पार्टी को राज्य में नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि वहां कुछ ऐसी राजनीतिक गतिविध्यिां हुई जिससे पार्टी को हानि पहंुची। बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने से भाजपा को नुकसान ही पहंुचा।
क्या उत्तर प्रदे’ा में बसपा के साथ गठबंध्न एक भूल थी?
मैं इसे भूल नहीं कहूंगा। वह एक प्रयोग था जो सपफल नहीं हो सका। वह प्रयोग प्रदेश के हित के लिए किया गया था क्योंकि हम चाहते थे कि प्रदेश जल्दी जल्दी चुनाव में न जाए।
उस असफल प्रयोग को दोहराया क्यों गया?
मैं इतना कहूंगा कि बसपा के साथ हमारा प्रयोग अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।

ऐसी अपफवाहें उड़ रहीं हैं कि बसपा और भाजपा में पिफर गठबंध्न होने जा रहा है। क्या यह सच है?

नहीं। फिलहाल ऐसी कोई संभावना नहीं है।
राजस्थान में भाजपा सरकार दो जातियों गुर्जर और मीणा को एक साथ नहीं रख पाती है। वहीं उत्तर प्रदेश में बसपा ब्राह्मण और दलितों को एक साथ लाने में सफल रही है।
देखिए, यह बसपा की तात्कालिक सपफलता है। हम तात्कालिक लाभ के लिए कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकते जिससे सामाजिक एकता टूटे। बसपा तो किसी भी जाति या वर्ग के बारे में कुछ भी कह सकती है। परंतु हम बोलेंगे तो पूरे देश के बारे में बोलेंगे।
अगर ऐसा तो पिफर सच्चर कमेटी का विरोध् क्यों?
हमारा मानना है कि देश में सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। देश का बंटवारा एक बार मजहबी आधर पर हो चुका है। अब दोबारा इस तरह का माहौल नहीं बनना चाहिए जिससे फिर मजहबी तौर पर अलगाव जैसी स्थिति दिखाई दे। इसलिए हम सच्चर के विरोध् में हैं।
सच्चर रिपोर्ट तो सिपर्फ पिछड़ेपन को दूर करने के लिए है।

हमारा यह कहना है किसी धर्म अथवा पंथ का कोई भी व्यक्ति अगर पिछड़ा है तो उसे आरक्षण मिलना चाहिए। मजहब के आधर पर नहीं होना चाहिए।
अगर एक मजहब में ज्यादा गरीबी है तो उसका क्या उपाय है?
मैं ऐसा नहीं मानता कि गरीबी केवल मुसलमानों में है। गरीबी तो हर मजहब और हर पंथ में है। इसलिए सबको समान व्यवहार से देखा जाना चाहिए।
पार्टी यह स्टैंड क्यों नहीं लेती कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर होना चाहिए?
दरअसल हमारे संविधन में ऐसी व्यवस्था है। हमारी पार्टी की यह नीति रही है कि अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों के अलावा जिन भी वर्गों में लोग गरीब हैं उन्हें सुविध मिलनी चाहिए।
अगर देश की सबसे पार्टी भाजपा है तो देश के मुसलमानों को वह अपने से क्यों नहीं जोड़ पाई?
ऐसा अभी नहीं हो पाया है। परंतु हमारी यह कोशिश रही है कि हम सबको यह बता पाएं कि हम सारे वर्गों के साथ हैं। भाजपा सबके साथ न्याय चाहती है, लेकिन हम हमेशा ही तुष्टीकरण के खिलापफ हैं।
क्या आपको नहीं लगता कि पार्टियां मुस्लिम नेताओं का इस्तेमाल तुष्टीकरण के लिए कर रही हैं?
बहुत सारी पार्टियां तुष्टीकरण की राजनीति करती हैं लेकिन भाजपा ऐसा कभी नहीं करती। हमारे यहां अगर कोई भी मुस्लिम लीडरशिप उभरी है तो वह स्वाभाविक रूप से उभरी है।
...लेकिन संवैधनिक तौर पर भारत सेकुलर देश है।
संविधन का जो हिंदी अनुवाद है उसमें सेुकलर शब्द का मतलब ध्र्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि ‘पंथनिरपेक्ष’ है। इसलिए मैं यह मांग कर रहा हूं कि ध्र्मनिरपेक्ष शब्द के प्रयोग पर पाबंदी लगनी चाहिए। आप तिरंगे झंडे को दखिए, उस पर जो चक्र है वह सारनाथ की खुदाई में मिला ध्र्मचक्र है। लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पीछे लिखा है, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के पीछे भी लिखा है। कैसे भारत ध्र्मनिरपेक्ष हो सकता है। सेकुलर शब्द जो बयालिसवें संशोधन में जोड़ा गया वह भी एक तुष्टीकरण भी था।
अगले चुनाव में प्रमुख मुद्दा क्या होगा?
आतंकवाद।
यह कैसे? आपके विदेश मंत्री तो आतंकवादियों को छोड़कर आए थे।
वह पफैसला सभी की सहमति से हुआ था। उस समय विमान में बैठे लोगों की जान बचाने के सिवाय कोई चारा हमारे पास नहीं था। वह मजबूरी में उठाया गया कदम था।
लेकिन आडवाणी जी ने अपनी किताब में कुछ और ही कहा है।
उन्होंने कुछ अलग नहीं कहा। उस पफैसले को नैतिकता के मापदंड पर नहीं तौला जा सकता। वह फैसला दबाव में लिया गया था।
क्या चुनाव में पार्टी इस पर जवाब दे पाएगी?
हम तैयार हैं और जनता को अपनी बात समझा लेंगे।
परमाणु करार का विरोध करके मध्य वर्ग की नाराजगी नहीं मोल ली है आपने?
हम अमेरिका के साथ किसी करार के विरोध् में नहीं है। हमारा विरोध् केवल इस बात पर है कि इससे हमारा परमाणु कार्यक्रम बाध्ति होगा।
महिला आरक्षण पर क्या कहेंगे?
हम हमेशा इसके पक्ष में है। संसदीय जगहों से पहले संगठनों में महिलाओं को उचित स्थान मिलना चाहिए।
पार्टी के अंदर लोकतंत्र की कमी है क्या?
नहीं बिल्कुल नहीं। हमारे जितना लोकतंत्रा है वह किसी भी पार्टी में नहीं है।
नेपाल के नए हालात के बारे में क्या कहेंगे?
वहां के हालात ठीक नहीं है। नेपाल को लेकर भारत सरकार का रवैया भी निराशाजनक रहा है।
क्या अगली सरकार वामपंथी दलों द्वारा नियंत्रित होगी?
नहीं। आज के हालात में यह संभव नहीं है। वामपंथियों की ताकत कम होने वाली है।
मुस्लिम उलेमाओं की ओर से आतंकवाद के खिलाफ जो पफतवा आया , उसके बारे में क्या राय है?स्वागत योग्य कदम है। इसको सराहा जाना चाहिए।
दिल्ली में मुख्यमंत्री कौन बनेगा?
यह पार्टी संसदीय बोर्ड और विधयकों द्वारा तय होगा।
लेकिन अरूण जेटली के रूप में एक प्रमुख नाम तो है आपके पास...।कोई भी फैसला पार्टी की संसदीय बोर्ड में लिया जाएगा।
राजनाथ सिंह प्रधनमंत्राी कब बनेंगे?
अभी तो आडवाणी जी को प्रधनमंत्री बनाना है;हंसते ।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

अमेरिकी सियासत का नया रंग

अनवारूल हक
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अमेरिका में जैसा लोकतंत्र है, दुनिया भर में एक अलग पहचान है। वहां चुनाव भी बेहद लोकतांत्रिक ढंग से होता है, जहां शुचिता और पारदर्शिता की पूरी संभावना रहती है। चुनाव के वक्त वहां आरोप-प्रत्यारोप तो लगते हैं, लेकिन किसी भी नवीन और अविकसित लोकतंत्र से बिल्कुल होते हैं। इसका मतलब यह कि राजनेताओं की भाषा का एक स्तर होता है और उनके मुद्दे भी देश के हित और अख्ंाडता से ही जुड़े होते हैं। हर एक का सलीका पूरी तरह लोकतांत्रिक होता है।परंतु पिछले दिनों राष्ट्रपति चुनाव की हलचल के बीच हिलेरी की ओबामा को घेरने की कोशिश अमेरिका की सियासत के बदलते रंग की एक झलक पेश कर गई। डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की होड़ में हिलेरी अपने प्रतिद्वंद्वी बराक ओबामा को 40 साल पहले के अमेरिकी चुनाव तक लेकर चली गईं और राबर्ट कैनेडी की हत्या का हवाला तक दे दिया। दरअसल वर्ष 1968 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅन एफ कैनेडी के छाटे भाई राबर्ट कैनेडी डेमोक्रेटिक पार्टी की ही ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने का चुनावी अभियान चला रहे थे और इसी दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी।उस प्रकरण का जिक्र हिलेरी ने क्यों किया? उनकी इस बेजुबानी से तो बड़े-बड़े सियासी जानकार भी हक्के-बक्के रह गए। यह बात अलग है कि खुद हिलेरी ने इस पर खेद जताने में जरा भी देर नहीं लगाई और सफाई दे डाली कि उनका इशारा बराक ओबामा की ओर कतई नहीं था। उनका कहना था कि उन्होंने बस एक संदर्भ के सिलसिले में राबर्ट कैनेडी की मिसाल दी थी। उध्र ओबामा का ध्ड़ा तो इस बात से हतप्रद तो हुआ, लेकिन हिलेरी के बैकपफुट पर चले जाने से उन्होंने इसे अपनी जीत ही मान लिया।इस प्रकरण से एक सवाल पैदा हुआ है कि क्या यह महज एक बेतुकी बयानबाजी थी या फिर अमेरिका की बदली सियासी फिजां का संकेत? कुछ इसे एक पूर्व राष्ट्रपति की बीबी की झल्लाहट के रूप में देखते हैं तो ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है जो अमेरकी राजनीति में आए विकार की इसे एक अहम मिसाल मानते हैं। कहा जा सकता है कि आने वाले समय में अमेरिका की राजनीति में ओछेपन की मात्रा और ज्यादा बढ़ने की संभावना है।

राजा-रानी बने कहानी

अनवारूल हक
नेपाल में राजवंश को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। यही कारण है कि राजवंश से जुड़े किसी भी राजा का आदेश नेपाल की जनता के लिए ईश्वरीय आदेश होता था। परंतु वंश के ग्यारहवीं पीढ़ी की तकदीर जिसके सहारे थी, वह भगवान न बन सका। उसे मंदिर रूपी नारायणहिती महल से किसी बेसहारा और लाचार इंसान की तरह बाहर जाते हुए देखा गया। नेपाली जनता ने इस मंजर को दिल पर पत्थर रखकर देखा और स्वीकार कर लिया। उन्हें बाबा गोरखनाथ की वह भविष्यवाणी भी याद आई, जिसमें उन्होंने नेपाल नरेश को श्राप देते हुए कहा था कि उनका राजवंश ग्यारहवीं पीढ़ी के बाद खत्म हो जाएगा। अब इसे पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की बदकिस्मती कहें या पिफर कुछ और कि वे ही ग्यारहवीं पीढ़ी के खेवनहार थे। ज्ञानेंद्र और उनका पूरा परिवार नेपाल की जनता की तकदीर का पफैसला करते करते अब अपनी तकदीर को सुधरने की कवायद में लग गया है। परंतु अब न तो सिंहासन है और न ही जन्नतनुमा महल।ज्ञानेंद्र अगर अपने महल से बेदखल हुए हैं तो उसमें अहम भूमिका माओवादियों की रही है। इस बात से कोई इनकार भी नहीं कर सकता। परंतु एक संशय सबके मन में है कि राजा के बाद अब नई सरकार नेपाल की आम जनता के लिए कितना कल्याण्कारी और सुकून देने वाली होगी? सियासी जानकार कहते हैं कि अगर नेपाल में नए सत्ताधरी राजशाही का पूरा स्मरण नेपाली जनता के मन से तभी दूर कर सकते हैं, जब वे उन्हें एक शुचितापूर्ण और विकासपरक शासनव्यवस्था देने में कामयाब हो पाएंगे। ज्यादातर नेपाली जनता के मन को यही बात कचोट रही है कि सैकड़ों साल से राजशाही के प्रति चले आए उनके विश्वास को राजवंश के ही एक राजा ने चकनाचूर कर दिया और अब जिन लोगों के पास उनके भाग्य की कुंडली जा रही है, उनके हाथ भी हजारों लोगों के खून से लाल हैं। ज्ञानेंद्र ने जब अपने भाई बीरेंद्र और उनके पूरे परिवार की मौत के बाद सिंहासन संभाला तो सोचा भी नहीं होगा कि इस अपमानजनक ढंग से उनको अपने राजपाठ से विदाई लेनी पड़ेगी। वर्ष 2001 से पहले नेपाल को छोड़ दुनिया के ज्यादातर लोग ज्ञानेंद्र और उनके नाम से अनजान थे। नेपाल की जनता भी उस वक्त अपने चहेते राजा बीरेंद्र के प्रेम और सम्मान में इस कदर नतमस्क थी कि उसे ज्ञानेंद्र को याद करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। परंतु एक जून 2001 की रात नेपाल के तत्कालीन राजा बीरेंद्र और उनकी प्रजा के लिए काली रही। पर ज्ञानेंद्र के लिए अपने भाई की मौत की एवज में एक साम्राज्य हाथ लग गया, जहां उन्हें अपनी महिमा और रसूख का डंका पीटने की पूरी आजादी थी। यह बात अलग है कि नरेश बीरेंद्र और उनके परिवार की हत्या की आरोप की कुछ छींटे उनकी ओर भी आईं। परंतु इस पर कुछ खुलकर सामने नहीं आ सका क्योंकि खुद वही पूरे निजाम के रखवाले थे। गौर करने वाली बात यह है कि ज्ञानेंद्र पहली बार राजा नहीं बने थे, बल्कि नेपाल का राजसिंहासन उनको उस उम्र में नसीब हो गया था जब उनको अपने माता-पिता के सिवाय किसी दूसरे की पहचान नहीं थी। दरअसल सन् 1950 में तत्कालीन प्रधनमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा और उनके दादा राजा त्रिभुवन के बीच तनाव इस स्तर तक बढ़ गया कि वे अपने बेटे और पोते यानी बीरेंद्र के साथ भारत चले आए। लेकिन उस दौरान तीन वर्षीय ज्ञानेंद्र वहीं रहे और राणा ने उनको खाली पड़ी राजगद्दी पर बैठा दिया। यह अलग बात है कि उस नन्हीं उम्र में वह नेपाल के राजशी सिंहासन पर केवल एक साल तक रह सके।बाद में राणा का राज नेपाली जनता के विरोध् के आगे ज्यादा चल न सका और पूरी सत्ता ज्ञानेंद्र के परिवार के हाथों में आ गई। परंतु ज्ञानेंद्र को दोबारा राजगद्दी पूरे पचास साल बाद नसीब हुई और वह भी तब जब वह खुद की और अपने बिगड़ैल बेटे पारस की करतूतों की वजह से बदनामी की चादर में लिपट चुके थे। उनके पहले राजा बीरेंद्र की छवि किसी देवता से कम नहीं थी। इसकी वजह यह थी कि वे नेपाली जनता की तरक्की के हर रास्ते की स्वीकार करते थे, चाहे वह रास्ता सत्ता पर उनकी पकड़ को कमजोर ही क्यों न कर रहा हो। जब बीरेंद्र के हाथों में नेपाल की कमान थी तब माओवादी अपनी हिंसक मंसूबों के बावजूद नेपाली आवाम का वह यकीन नहीं जीत पाए थे जो उन्होंने ज्ञानेंद्र के समय थोड़ी सी मसक्कत में प्राप्त कर लिया।कहने का मलब सापफ है कि मौजूदा समय में अपने और खानदान की बदतरी के लिए ज्ञानेंद्र की कारगुजारियां ही जिम्मेदार हैं। वे कहीं अध्कि चालाक बनने की कोशिश में भारत जैसे विशाल पड़ोसी देश के साथ भी ध्ूर्तता का परिचय देने लगे और चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाने लगे। महत्वपूर्ण है कि इस वंश का नाता भारत से पुराना है। इस वंश के पुरोध पृथ्वी नारायण शाह खुद उस समय भारत में स्थित गोरखा रियासत के राजा थे। सन् 1768 में उन्होंने काठमांडू राज्य का गठन किया जो बाद में नेपाल का शक्ल ले लिया। उसके बाद बीसवीं सदी में नेपाल कुछ सालों तक राणा परिवार के हाथों में संचालित हुआ लेकिन पिफर इसी शाह परिवार के हाथों में बागडोर आ गई। इतनी समृ( विरासत और भारत से निकटता के बावजूद ज्ञानेंद्र और उनके युवराज पारस ने वह सब कुछ किया जो उनके पूर्वजों ने कभी सोचा न था। उन्होंने राजशाही की सबसे बड़ी ताकत नेपाली जनता जनता के अटूट विश्वास को तार-तार कर दिया। हालत यहां तक आ गई कि उनके कदमों में अपना माथा टेकने वाले उन्हें रास्ता दिखाने लगे। अब खुद ज्ञानेंद्र पश्चाताप और सुधर के समंदर में डुबकी लगा लंे तो भी महल की ओर उनके लिए रास्ता बनाना असंभव सा लगता है।
सच हुई भविष्यवाणी
नेपाल के राजा वीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या की हत्या कथित तौर ;ज्ञानेंद्र के कथन के बतौरद्ध उनके ही पुत्रा के हाथों हुई। इस बात को स्वीकार करना नेपाली जनमानस के लिए कठिन था क्योंकि नेपाली जनमानस में ज्ञानेंद्र को ही दीपेंद्र सहित पूरे परिवार का हत्यारा मान लिया गया है, जो ठीक भी है।लेकिन यह भविष्यवाणी 230 साल पहले ही हो चुकी थी। यह भविष्यवाणी गोरखाओं के कुलगुरू गोरखनाथ ने की थी। नेपाल में यह किवदंती पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से आम जनता के बीच चर्चा का विषय रही है। नेपाल के इतिहास पर लेखक आदित्य मान श्रेष्ठ ने अपनी पुस्तक ‘ड्रेडपफुल नाइट-कारनेज ऐट नेपालीज रायल पैलेस’ ;एकता बुक्स, काठमांडो, नेपाल, 2001, पृष्ठ 92द्ध तथा प्रोपफेसर राजनाथ पांडेय ;ज्ञानपीठ प्राइवेट लिमिटेड, पटना, 1964, पृष्ठ परिशिष्ट क 86द्ध ने अपनी पुस्तक ‘नेपाल और नेपाल नरेश’ में इस किवदंती का जिक्र भी किया है। किवदंती के अनुसार पृथ्वी नारायण शाह उस वक्त आयु में छोटे थे। एक दिन गोरखाओं के कुलगुरू बाबा गोरखनाथ अपनी गुपफा से निकल कर उनके पास आए। बाबा गोरखनाथ ने प्रसाद के रूप में अपने मुंह से दही निकालकर पृथ्वी नारायण शाह के हाथों में रखा। लेकिन बालक पृथ्वी नारायण शाह ने उस प्रसाद को पफंेक दिया। पफेंका गया प्रसाद बालक पृथ्वी नारायण के पैरों की दस अंगुलियों पर गिरा। यह देखकर बाबा गोरखनाथ क्रोध्ति हो गए और उन्होंने पृथ्वी नारायण शाह को श्राप दिया कि उनके दस पीढ़ी बाद यानी ग्यारहवीं पीढ़ी में उनका वंश की सत्ता खत्म हो जाएगी। यह भविष्यवाणी अब सही साबित हुई है। महाराजा दीपेंद्र शाह इस वंशावली में ग्यारहवीं पीढ़ी हैं। नेपाली जनमानस ने ज्ञानेंद्र को बतौर महाराज कभी नहीं स्वीकार किया, बल्कि उनके खिलापफ विद्रोह का झंडा उठा लिया।

मुगाबे तानाशाह हुआ...

अनवारूल हक
कभी उसे एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने अपना मसीहा माना था और यह मानकर उसे अपने मुल्क की बागडोर सौंपी थी कि वह उनकी बदहाली को खुशहाली में बदल देगा। परंतु वह शख्स लोगों का मसीहा तो न बन सका, लेकिन उनकी जिंदगी की बदतरी का निर्माता जरूर बन गया। यहां बात अफ्रीकी महाद्वीप के बदहाल देश जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति राॅबर्ट मुगाबे की हो रही है। पिछले तीस सालों से जिम्बाब्वे पर अपना चाबुक चला रहे मुगाबे किसी भी सूरत में झुकने को तैयार नहीं दिखते। कुछ महीने पहले संपन्न उस चुनाव में उन्होंने खुद को विजेता घोषित कर लिया, जिसकी विश्वसनीयता एक फीसदी भी नहीं है। दुनिया के बड़े- बड़े पर्यवेक्षक इस चुनाव को बेमानी करार दे चुके हैं। अप्रैल 2008 में जब जिम्बाब्वे में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुआ तो मुगाबे के प्रतिद्वंद्वी माॅगर्न स्वानागिरे ने पहले चरण में मुगाबे को पराजित कर दिया। इसके बाद मुगाबे के समर्थकों ने हिंसा का तांडव पूरे देश में मचा दिया और मजबूरन माॅर्गन को चुनाव के दूसरे चरण से खुद को अलग करना पड़ा। कुछ दिनों पहले जब मुगाबे ने खुद को विजयी करार दिया तो उनकी खूब छीछालेदर हुई। चैतरपफा घिरने के बाद वे थोड़ा नरम पड़े। परंतु अभी वही पुरानी मनमानी दोहरा रहे हैं कि वे किसी भी हाल में राष्ट्रपति की कुर्सी पर बने रहना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे बातचीत के लिए तभी तैयार होंगे जब सभी पक्ष उनको राष्ट्रपति मानने के लिए तैयार होंगे। उनकी इस जिद से अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक भी असमंजस में पड़ गए हैं कि वे मुगाबे से बातचीत कैसे बढ़ाएं? उल्लेखनीय है कि दुनिया के सभी बड़े देशों ने जिंबाब्वे को दी जाने वाली मदद तो रोक ही दी, साथ ही कई तरह के प्रतिबंध् भी लगा दिए हैं। प्रतिबंध् लगाने के मामले में अमेरिका और ब्रिटेन सबसे आगे रहे। लेकिन दूसरी ओर रूस और चीन ने मुगाबे के खिलापफ उठाए कदमों पर वीटो कर दिया। मुगाबे के प्रति मुगाबे की नाराजगी का आलम यह रहा कि ब्रिटेन ने उनको दिया गया नाईटहुड सम्मान भी वापस ले लिया। यह जिम्बाब्वे का दुर्भाग्य रहा कि देश पहले अंग्रेजी शासन का गुलाम रहा और अब अपने ही एक नेता का गुलाम है। 18 अप्रैल 1980 की तारीख जब ब्रिटेन ने जिम्बाब्वे को आजाद घोषित किया, उस समय पूरी दुनिया को लगा कि अफ्रीकी महाद्वीप का यह तंगहाल देश अब तरक्की की नई इबारत लिखेगा। लेकिन लोगों की यह उम्मीद परवान न चढ़ सकी। जिम्बाब्वे की आजादी से लेकर अब तक पूरी दुनिया ने भले ही बहुत कुछ बदलाव देख लिया हो लेकिन इस मुल्क की अवाम ने बदलाव के नाम पर सिर्फ इतना देखा कि उनकी बदहाली का ग्रापफ पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया। मुगाबे ने अपने 30 साल के शासनकाल के दौरान कुछ काम जरूर किए जिसे देश की जनता के लिए शुरू हितकर कहा गया। जिम्बाब्वे की जमींदारी प्रथा को तोड़ने का काम सर्वप्रथम उन्होंने ही किया। लेकिन आज तक जमीनों का उचित बंटवारा न हो सका। नतीजा यह रहा कि जमीन के लिए हिंसा का लंबा दौर चला। मौजूदा समय में जिम्बाब्वे दुनिया का एक ऐसा देश है जहां के हर सेक्टर में विकास दर शून्य के बराबर है। यही नहीं मंहगाई आसमान छू रही है और लोग बुनियादी जरूरतों को तरसने लगे हैं। एक अनुमान के अनुसार सन् 2000 से जिम्बाब्वे के अंदर 32 फीसदी सेे भी ज्यादा की दर से मंहगाई बढ़ी। वर्तमान समय में जिम्बाब्वे में बेरोजगारी की दर 80 फीसदी है। अगर देश में औसत आयु की बात करें तों पुरुषों की औसत उम्र 37 साल है तो वहीं औरतों की 34 साल है। जिम्बाब्वे की बदहाली के लिए पूरी दुनिया भले ही मुगाबे को कोस रही हो, पर मुगाबे खुद को इसके लिए जिम्मेदार नहीं मानते। उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोप की गलत नीतियां भी कापफी हद तक उनके मुल्क को बदहाल बनाने के लिए जिम्मेदार हैं। गौर करने वाली बात है कि वे माक्र्सवादी विचारधरा के नेता हैं और संभवतः यही वजह है कि उनकी अमेरिका जैसे देश से नहीं बनी। अब जब खुद उनके देश के लोग उनसे त्रस्त आ चुके हैं तो मुगाबे कैसे राष्ट्रपति बने रह सकते हैं? इस सवाल को आज हर कोई पूछ रहा है। मुगाबे की बात करें तो उनके पास इसका एक ही जवाब है उनके सिवाय कोई दूजा जिम्बाब्वे की सत्ता नहीं संभाल सकता।

मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों?

अनवारूल हक
देश का आम मुसलमान पेसोपेश में है। आज से नहीं बल्कि पिछले साठ वर्षों से है। कभी उसके समर्पण का इम्तहान होता है तो कभी उसको शक के दायरे में खड़ा कर दिया जाता है। कई मौके तो ऐसे भी आते हैं जब सिर्फ और सिर्फ एक मुसलमान को ही अपने भारतीय होने की या पिफर कहें कि भारतीयता की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती मिलती है। इसमें वह मासूम और अपनी ही दुनिया में मशगूल मुसलमान भले ही बेकसूर हो, पर उसको कसूरवार बनाने का जुर्म हो रहा है और ऐसे जुर्म को अंजाम देने वाले भी गैर नहीं, बल्कि उन्हीं में से चंद हैं।कोई मजहब के नाम पर, कोई जिहाद के नाम पर तो कोई किसी बाहरी ताकत की पफरमानी के नाम पर या तो खुद गुमराह हो जाता है या फिर चंद लोगों को उस रास्ते पर धकेल देता है जो केवल वतनखिलापफी की ओर जाता है। नतीजा कोई और भुगतता है। कभी-कभार तो पूरी कौम जवाबदेह हो जाती है। ऐसे मौके पर मुस्लिम लीडरशिप का असल इम्तहान होता है, लेकिन अफसोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि एक मुसलमान को तो अब तक अपने रहनुमाओं से नाउम्मीदी ही हाथ लगी है।मसला आतंकवाद का हो, कश्मीर का हो, देश के किसी संवेदनशील मुद्दे का हो या पिफर ऐटमी डील का हो, हर जगह मुसलमानों को अलग-थलग करने की शातिराना कोशिश होती है और नतीजतन पूरी कौम पर एक इल्जाम, वह भी देश की मुख्यधरा से अलग होने का, स्वतः ही लग जाता है। देश के ज्यादातर मसलों पर मुसलमानों को अलग रखकर दृष्टिकोण बनाने का सिलसिला नया तो नहीं है। परंतु एक बात जरूर है कि उनको हमेशा ही देश के दूसरे समुदायों से अलग रखकर तौलने का क्रम मौजूदा दौर ज्यादा बढ़ा है।सवाल कई हैं। सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों है? इसका जवाब तलाशने की कोशश तो की ही जा सकती है। महत्वपूर्ण बात यह भी है आज जब हर जगह वैश्वीकरण और आध्ुनिकता की बयार चल रही तो ऐसे में मुसलमानों के लिए कोई दूसरा मानदंड तो नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। जिस सवाल को यहां खड़ा किया गया है, वह मजहबी तो हरगि”ा नहीं है, सियासी जरूर है। सियासी इसलिए भी है कि मुसलमान भी देश की हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बराबर का भागीदार और वाजिब हकदार है।वास्तविक के धरातल पर तस्वीर दूसरी है। कई बार ऐसा होता है जब देश के मुसलमानों को बाकी देश के साथ नजर आना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मुसलमानों को अलग-थलग रखने की साजिश होती है और ऐसा नजर आने लगता है कि वे देश की अवाम से अलग हैं। हाल ही में न्यूक्लियर डील को बेवजह मुस्लिम हितों के साथ जोड़ा गया। इस पर मुस्लिम समाज में जोरदार विरोध् होना चाहिए था। विरोध् तो हुआ, लेकिन एक स्वर में नहीं। यह बात थोड़ा हैरान करने वाली थी कि उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम-मजहबी लीडरों ने इस पर अपने पफायदे को माप-तौलकर बयानबाजी किया। कई उलेमा तो नंगे पांव उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्राी मायावती के दरबार तक पहुंच गए। उनका वहां पहुंचने का मकसद अपनी कौम की भलाई तो कतई नहीं था, बल्कि उसमें सियासत की बू सापफ नजर आ रही थी।ऐटमी डील पर देश के आम मुसलमान भले ही कोई ऐतराज न करे, लेकिन उनकी रहनुमाई का दावा करने वाले कुछ रहनुमाओं को इस पर ऐतराज था। इस ऐतराज का आधर क्या था? सिपर्फ और सिपर्फ अमेरिका। यह बात सही है कि अमेरिका से मुसलमानों का ऐतराज है और कुछ मामलों में यह तर्कसंगत भी है। वह इसलिए कि इराक, अफगानिस्तान और कुछ हद तक पिफलिस्तीन में अमेरिका की नीतियों से इन देशों के बाशिंदों को हिंसा का घोर तांडव झेलना पड़ा है और वे बाशिंदे मुसलमान हैं। ऐसे में आम मुसलमानों के अंदर भी अमेरिका को लेकर आक्रोश से भरी सोच का पनपना स्वाभाविक ही कहा जाएगा।परंतु सवाल यह है कि दुश्मनी या आक्रोश तो अमेरिका के साथ है, भारत के साथ तो नहीं। ऐटमी डील की वकालत करते हुए देश की सरकार जब बार-बार कह रही है कि इसमें भारत का महत्वपूर्ण हित जुड़ा है तो देश के हर कौम के नागरिक को, चाहे वह किसी मजहब का हो, डील का समर्थन करना चाहिए। लेकिन मुसलमानों के नजरिए से यह नहीं दिखा। कहने का मतलब यह है कि मुस्लिम रहनुमाई इस पर दोमुंहा राग अलापती नजर आई। यह बात दीगर है कि आम मुसलमान जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस कदर मशगूल है कि उसे डील की समझ शायद ही हो सकती है, उसने नाराजगी नहीं जताई। शायद उसे डील की परवाह इस मायने में भी न हो कि यह अमेरिका के साथ हो रही है। लेकिन अपफसोसनाक बात यह है कि कुछ लोगों ने मुसलमानों को इस मसले पर भी अलग-थलग करने का काम किया और वे सपफल भी रहे।केवल डील ही नहीं, देश और मसलों पर मुसलमानों को अलग करने की कोशिशें होती हैं और ऐसा करने वालों को दुर्भाग्यवश कामयाबी मिल जाती है। आतंकवाद के मुद्दे पर तो लोगों को बरगलाने और अनजान और बेकसूर मुसलमानों को भी कटघरे में खड़ा करने से परहेज नहीं किया जाता। आज आलम यह हो चुका है कि दुनिया के हर कोने में एक आम मुसलमान को भी शक की निगाह से देखा जाता है।आतंकवाद से अलग, अभी हाल ही कश्मीर में जब श्राइन बोर्ड की जमीन को लेकर बवाल खड़ा हुआ तो देश की मुख्यधरा से अलग एक बार पिफर मुसलमानों को अलग करने की कोशिश की गई और सारे मुसलमान नेताओं ने इस पर अपना मुंह सिल लिया। क्या जरूरत इस बात कि नहीं थी कि मुस्लिम लीडरशिप खुद को ऐसे मसलों पर स्पष्ट करे, जो संवेदनशील होते हैं। ऐसे मुद्दे पर मुस्लिम लीडरशिप की खामोशी आम मुसलमानों को ही नुकसान पहंुचाने का काम करती है।सवाल यह है कि मुसलमानों को गुमराह करने और उनकी बेचारगी का पफायदा उठाने का सिलसिला कब थमेगा? इसको रोकने के रास्ते क्या हैं? क्या मुसलमान इस हद तक जागरूक नहीं हैं कि वह खुद के इस्तेमाल को समझ सके? वह भला देश की धरा से क्यों अलग चलना चाहेगा? ऐसे कई सवाल हैं जो उठाए जा सकते हैं। लेकिन सबका जवाब सबसे पहले मुस्लिम कौम को ही देना होगा। बड़ी जिम्मेदारी मुस्लिम रहनुमाई की भी है। उसे अपनी भूमिका पर दोबारा सोचना होगा और अपनी लाइन भी बदलनी होगी। उनको इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि उन पर अब और कीचड़ न उछले। दायित्व उस आम मुसलमान का भी है जो तरक्कीपंसद है कि वह खुद को देश की मुख्यधारा से जोड़ कर चले। इसके बाद ही उस पर उठने वाली हर उंगली स्वतः ही गिर जाएगी।