<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643</id><updated>2012-02-16T09:51:57.487-08:00</updated><category term='राजनीति की गिरती मर्यादा'/><title type='text'>अवलोकन Avlokan</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>15</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-3279642454301758232</id><published>2008-08-25T20:55:00.000-07:00</published><updated>2008-08-25T21:28:16.987-07:00</updated><title type='text'>जार्जिया से सीखें हम लोग</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अनवर &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;लोगों&lt;/span&gt; को इस बात को समझना चाहिए की देश में स्थिरता की सख्त जरूरत  है । नहीं तो हम केवल चीन के सफलताओं की तरीफ ही करते रह जायेंगे। जम्मू और कश्मीर में उठे विवाद से साफ हो गया की हमने साथ वर्षों  के इस  लोकतंत्र  के प्रति अपनी जिमीदारियों को नहीं समाज सके। पूरी दुनिया आज मजाक  के नजरिये से देख रही है। इसकी वजह केवल इतनी है की हमने  बेहद दुखद राजनितिक मूर्खता का परिचय दिया है। अब तो हमें लगता है की हम लोगो को जार्जिया से थोडी बहुत सीख लेनी चाहिए जिसने बड़ी साम्यवादी ताकत रूस से लोहा लेने के बाद भी कूटनीतिक ढंग ले  साउथ अस्सोतिया पर अपना रूख बरक़रार रख सका। जार्जिया की जगह भारत रहता तो क्या होता? जरा सोचिये की वहां की जनता ने कोई ऐसा कदम उठाया था जिससे जार्जिया की सरकार को कोई संकट का सामना करना पड़े । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दरअसल इसमे दोष  किसी को नहीं दिया जा सकता क्योकि हम भारत्या बेहद भाऊक हैं और आस्था रखने वाली चीजों पर सियासत करने से गुरेज नहीं करते। कहने का मतलब की दहर्म की आस्था  अपने देश की आस्था से कहीं आगे निकल जाती है। ऐसा होने पर परिणाम केवल विघटन होता है। कोई मने या न मने मजहब के आवरण में जितने भी विवाद हुए उसमे सिवाय भारत के कलंकित होने से कुछ नहीं निकला। साथ ही जो लो इस देश को तोड़ना चाहते है वे ही मजबूत हो गए। मजहब के खेत में राजनीती की फसल उगने से नतीजा सिर्फ विनास&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; है और अपने देश  तार्राकी के मामले में वर्षों पीछे चला जाता है।कलम साहब उन लोगो के सपनो का क्या होगा जिसकी ताबीर भारत को विकसित करने की है। जब तक लोग इस बात को नहीं समझेंगे की धर्म व्यक्तिगत और सामाजिक धारा के दायरे में आता है , न की राष्ट्रया धारा के दायरे में, तब तक ऐसे ही देश पर आए संकट को दूर नहीं किया जा सकेगा। हम तो हर हल में कहते हैं की देश किसी मजहब पहले आता है और किसी भी मजहब से ज्यादा अहमियत रखता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-3279642454301758232?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/3279642454301758232/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=3279642454301758232' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/3279642454301758232'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/3279642454301758232'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html' title='जार्जिया से सीखें हम लोग'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' 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href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=3888958518062052351' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/3888958518062052351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/3888958518062052351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_9742.html' title='अभिनव तुझे सलाम'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' 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संवाद पाठकों के लिए अविकल रूप से प्रस्तुत है:&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या देश के 12 राज्यों में सत्तासीन होने को आधार बनाकर आपने कहा है कि भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;केवल इसी आधार पर मैंने यह दावा नहीं किया कि भाजपा सबसे बड़ा दल है। अगर आप विश्लेषण करेंगे तो पता चलेगा कि जिन राज्यों में हमारी पार्टी की सरकारें हैं, वहां कुल 200 से अधिक लोकसभा क्षेत्रा आते हैं। वहीं कांगे्रस की जहां सरकारें है वहां यह आंकड़ा 150 से भी कम होगा। यही नहीं अब तो हमने कर्नाटक के साथ दक्षिण भारत में प्रवेश कर लिया है। इसका मतलब यह कि हमारी पार्टी अब संपूर्ण भारत की पार्टी है और सबसे बड़ी पार्टी भी है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पार्टी की इस सफलता को आप कैसे आंकते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्रा भारत में यह पहली बार हुआ है कि कोई दल कांग्रेस से आगे निकलने में कामयाब रहा है। अब हम  सांगठनिक और भौगोलिक दोनों तरह से कांग्रेस या किसी भी अन्य राजनीतिक दल से आगे निकल चुके हैं। निश्चित तौर पर यह पार्टी के लिए बहुत बड़ी सपफलता है। मौजूदा समय में देश के 65 प्रतिशत मतदान केंद्रों पर हमारी पहुंच है। इसे और भी ज्यादा बढ़ाने के लिए मैं अपने कार्यकर्ताओं से अपील कर चुका हूं। मुझे विश्वास है कि पार्टी अभी और आगे बढ़ेगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कांग्रेस का आरोप है कि कर्नाटक में आपको धुप्पल में ही सपफलता मिली है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देखिए, मेरे इस दावे को कि भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है, कांग्रेस भी इसको गलत बताने का साहस नहीं दिखा पाई क्योंकि यह सच्चाई है। कर्नाटक में जनता ने कांग्रेस और जे डी;एसद्ध दोनों को नकार दिया और भाजपा में अपना विश्वास जताया है। येदियुरप्पा के नेतृत्व को भी कर्नाटक की जनता ने स्वीकार किया है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कर्नाटक के बाद क्या भाजपा पूरे दक्षिण भारत मंें इसी तरह का कारनामा दोहरा पाएगी?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;कर्नाटक ने हमारे लिए दक्षिण में एक द्वार खोलने का काम किया है। मैं इतना निश्चित तौर से कह सकता हूं कि दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में फिलहाल हमारी सरकार भले ही न बने परंतु हम अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में सपफल होंगे। लोगों का पार्टी में विश्वास बढ़ा है। पहले इसे उत्तर की पार्टी कहा जाता था। फिर पूरब की पार्टी बनी। इसके बाद भाजपा पूरे उत्तर भारत की पार्टी बनी। अब पार्टी जब दक्षिण भारत में सत्तासीन हुई है तो इसे अखिल भारतीय पार्टी ही मानी जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वह राज्य, जहां पार्टी कभी नंबर एक की पोजीशन पर थी, आज वहां हालत खराब है। इसके बारे में क्या कहेंगे?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;मुझे पता है कि आप उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं। वहां हमने सरकार भी चलाई और कई सफलताएं पाईं। लेकिन पिफलहाल पार्टी की हालत प्रदेश में पहले जैसी नहीं है। हमें उम्मीद है कि वहां एक बार पिफर पार्टी पहले वाली स्थिति में आएगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उत्तर प्रदेश में पार्टी क्यों इतनी बुरी स्थिति में पहंुची ?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;पार्टी को राज्य में नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि वहां कुछ ऐसी राजनीतिक गतिविध्यिां हुई जिससे पार्टी को हानि पहंुची। बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने से भाजपा को नुकसान ही पहंुचा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या उत्तर प्रदे’ा में बसपा के साथ गठबंध्न एक भूल थी?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;मैं इसे भूल नहीं कहूंगा। वह एक प्रयोग था जो सपफल नहीं हो सका। वह प्रयोग प्रदेश के हित के लिए किया गया था क्योंकि हम चाहते थे कि प्रदेश जल्दी जल्दी चुनाव में न जाए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उस असफल प्रयोग को दोहराया क्यों गया?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं इतना कहूंगा कि बसपा के साथ हमारा प्रयोग अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;ऐसी अपफवाहें उड़ रहीं हैं कि बसपा और भाजपा में पिफर गठबंध्न होने जा रहा है। क्या यह सच है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नहीं। फिलहाल ऐसी कोई संभावना नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजस्थान में भाजपा सरकार दो जातियों गुर्जर और मीणा को एक साथ नहीं रख पाती है। वहीं उत्तर प्रदेश में बसपा ब्राह्मण और दलितों को एक साथ लाने में सफल रही है।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;देखिए, यह बसपा की तात्कालिक सपफलता है। हम तात्कालिक लाभ के लिए कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकते जिससे सामाजिक एकता टूटे। बसपा तो किसी भी जाति या वर्ग के बारे में कुछ भी कह सकती है। परंतु हम बोलेंगे तो पूरे देश के बारे में बोलेंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर ऐसा तो पिफर सच्चर कमेटी का विरोध् क्यों?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;हमारा मानना है कि देश में  सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। देश का बंटवारा एक बार मजहबी आधर पर हो चुका है। अब दोबारा इस तरह का माहौल नहीं बनना चाहिए जिससे फिर मजहबी तौर पर अलगाव जैसी स्थिति दिखाई दे। इसलिए हम सच्चर के विरोध् में हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सच्चर रिपोर्ट तो सिपर्फ पिछड़ेपन को दूर करने के लिए है।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारा यह कहना है किसी धर्म अथवा पंथ का कोई भी व्यक्ति अगर पिछड़ा है तो उसे आरक्षण मिलना चाहिए। मजहब के आधर पर नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर एक मजहब में ज्यादा गरीबी है तो उसका क्या उपाय है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं ऐसा नहीं मानता कि गरीबी केवल मुसलमानों में है। गरीबी तो हर मजहब और हर पंथ में है। इसलिए सबको समान व्यवहार से देखा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पार्टी यह स्टैंड क्यों नहीं लेती कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर होना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;दरअसल हमारे संविधन में ऐसी व्यवस्था है। हमारी पार्टी की यह नीति रही है कि अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों के अलावा जिन भी वर्गों में लोग गरीब हैं उन्हें सुविध मिलनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर देश की सबसे पार्टी भाजपा है तो देश के मुसलमानों को वह अपने से क्यों नहीं जोड़ पाई?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ऐसा अभी नहीं हो पाया है। परंतु हमारी यह कोशिश रही है कि हम सबको यह बता पाएं कि हम सारे वर्गों के साथ हैं। भाजपा सबके साथ न्याय चाहती है, लेकिन हम हमेशा ही तुष्टीकरण के खिलापफ हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या आपको नहीं लगता कि पार्टियां मुस्लिम नेताओं का इस्तेमाल तुष्टीकरण के लिए कर रही हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बहुत सारी पार्टियां तुष्टीकरण की राजनीति करती हैं लेकिन भाजपा ऐसा कभी नहीं करती। हमारे यहां अगर कोई भी मुस्लिम लीडरशिप उभरी है तो वह स्वाभाविक रूप से उभरी है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;...लेकिन संवैधनिक तौर पर भारत सेकुलर देश है।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;संविधन का जो हिंदी अनुवाद है उसमें सेुकलर शब्द का मतलब ध्र्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि ‘पंथनिरपेक्ष’ है। इसलिए मैं यह मांग कर रहा हूं कि ध्र्मनिरपेक्ष शब्द के प्रयोग पर पाबंदी लगनी चाहिए। आप तिरंगे झंडे को दखिए, उस पर जो चक्र है वह सारनाथ की खुदाई में मिला ध्र्मचक्र है। लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पीछे लिखा है, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के पीछे भी लिखा है। कैसे भारत ध्र्मनिरपेक्ष हो सकता है। सेकुलर शब्द जो बयालिसवें संशोधन में जोड़ा गया वह भी एक तुष्टीकरण भी था।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगले चुनाव में प्रमुख मुद्दा क्या होगा?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आतंकवाद।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह कैसे? आपके विदेश मंत्री तो आतंकवादियों को छोड़कर आए थे।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;वह पफैसला सभी की सहमति से हुआ था। उस समय विमान में बैठे लोगों की जान बचाने के सिवाय कोई चारा हमारे पास नहीं था। वह मजबूरी में उठाया गया कदम था।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन आडवाणी जी ने अपनी किताब में कुछ और ही कहा है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कुछ अलग नहीं कहा। उस पफैसले को नैतिकता के मापदंड पर नहीं तौला जा सकता। वह फैसला दबाव में लिया गया था।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या चुनाव में पार्टी इस पर जवाब दे पाएगी?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;हम तैयार हैं और जनता को अपनी बात समझा लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;परमाणु करार का विरोध करके मध्य वर्ग की नाराजगी नहीं मोल ली है आपने?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;हम अमेरिका के साथ किसी करार के विरोध् में नहीं है। हमारा विरोध् केवल इस बात पर है कि इससे हमारा परमाणु कार्यक्रम बाध्ति होगा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;महिला आरक्षण पर क्या कहेंगे?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हम हमेशा इसके पक्ष में है। संसदीय जगहों से पहले संगठनों में महिलाओं को उचित स्थान मिलना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पार्टी के अंदर लोकतंत्र की कमी है क्या?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नहीं बिल्कुल नहीं। हमारे जितना लोकतंत्रा है वह किसी भी पार्टी में नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नेपाल के नए हालात के बारे में क्या कहेंगे?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;वहां के हालात ठीक नहीं है। नेपाल को लेकर भारत सरकार का रवैया भी निराशाजनक रहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या अगली सरकार वामपंथी दलों द्वारा नियंत्रित होगी?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नहीं। आज के हालात में यह संभव नहीं है। वामपंथियों की ताकत कम होने वाली है।&lt;br /&gt;मुस्लिम उलेमाओं की ओर से आतंकवाद के खिलाफ जो पफतवा आया , उसके बारे में क्या राय है?स्वागत योग्य कदम है। इसको सराहा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दिल्ली में मुख्यमंत्री कौन बनेगा?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह पार्टी संसदीय बोर्ड और विधयकों द्वारा तय होगा।&lt;br /&gt;लेकिन अरूण जेटली के रूप में एक प्रमुख नाम तो है आपके पास...।कोई भी फैसला पार्टी की संसदीय बोर्ड में लिया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजनाथ सिंह प्रधनमंत्राी कब बनेंगे?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अभी तो आडवाणी जी को प्रधनमंत्री बनाना है;हंसते ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-4979015859328029814?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/4979015859328029814/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=4979015859328029814' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/4979015859328029814'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/4979015859328029814'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_10.html' title='.राजनाथ सिंह का साक्षात्कार'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-8767144795091784014</id><published>2008-08-08T22:54:00.000-07:00</published><updated>2008-08-08T22:55:51.284-07:00</updated><title type='text'>अमेरिकी सियासत का नया रंग</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अनवारूल हक&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अमेरिका में जैसा लोकतंत्र है, दुनिया भर में एक अलग पहचान है। वहां चुनाव भी बेहद लोकतांत्रिक ढंग से होता है, जहां शुचिता और पारदर्शिता की पूरी संभावना रहती है। चुनाव के वक्त वहां आरोप-प्रत्यारोप तो लगते हैं, लेकिन किसी भी नवीन और अविकसित लोकतंत्र से बिल्कुल होते हैं। इसका मतलब यह कि राजनेताओं की भाषा का एक स्तर होता है और उनके मुद्दे भी देश के हित और अख्ंाडता से ही जुड़े होते हैं। हर एक का सलीका पूरी तरह लोकतांत्रिक होता है।परंतु पिछले दिनों राष्ट्रपति चुनाव की हलचल के बीच हिलेरी की ओबामा को घेरने की कोशिश अमेरिका की सियासत के बदलते रंग की एक झलक पेश कर गई। डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की होड़ में हिलेरी अपने प्रतिद्वंद्वी बराक ओबामा को 40 साल पहले के अमेरिकी चुनाव तक लेकर चली गईं और राबर्ट कैनेडी की हत्या का हवाला तक दे दिया। दरअसल वर्ष 1968 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅन एफ कैनेडी के छाटे भाई राबर्ट कैनेडी डेमोक्रेटिक पार्टी की ही ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने का चुनावी अभियान चला रहे थे और इसी दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी।उस प्रकरण का जिक्र हिलेरी ने क्यों किया? उनकी इस बेजुबानी से तो बड़े-बड़े सियासी जानकार भी हक्के-बक्के रह गए। यह बात अलग है कि खुद हिलेरी ने इस पर खेद जताने में जरा भी देर नहीं लगाई और सफाई दे डाली कि उनका इशारा बराक ओबामा की ओर कतई नहीं था। उनका कहना था कि उन्होंने बस एक संदर्भ के सिलसिले में राबर्ट कैनेडी की मिसाल दी थी। उध्र ओबामा का ध्ड़ा तो इस बात से हतप्रद तो हुआ, लेकिन हिलेरी के बैकपफुट पर चले जाने से उन्होंने इसे अपनी जीत ही मान लिया।इस प्रकरण से एक सवाल पैदा हुआ है कि क्या यह महज एक  बेतुकी बयानबाजी थी या फिर अमेरिका की बदली सियासी फिजां का संकेत? कुछ इसे एक पूर्व राष्ट्रपति की बीबी की झल्लाहट के रूप में देखते हैं तो ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है जो अमेरकी राजनीति में आए विकार की इसे एक अहम मिसाल मानते हैं। कहा जा सकता है कि आने वाले समय में अमेरिका की राजनीति में ओछेपन की मात्रा और ज्यादा बढ़ने की संभावना है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-8767144795091784014?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/8767144795091784014/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=8767144795091784014' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8767144795091784014'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8767144795091784014'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_5284.html' title='अमेरिकी सियासत का नया रंग'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-8593530442445333576</id><published>2008-08-08T22:49:00.000-07:00</published><updated>2008-08-08T22:50:08.365-07:00</updated><title type='text'>राजा-रानी बने कहानी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अनवारूल हक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नेपाल में राजवंश को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। यही कारण है कि राजवंश से जुड़े किसी भी राजा का आदेश नेपाल की जनता के लिए ईश्वरीय आदेश होता था। परंतु वंश के ग्यारहवीं पीढ़ी की तकदीर जिसके सहारे थी, वह भगवान न बन सका। उसे मंदिर रूपी नारायणहिती महल से किसी बेसहारा और लाचार इंसान की तरह बाहर जाते हुए देखा गया। नेपाली जनता ने इस मंजर को दिल पर पत्थर रखकर देखा और स्वीकार कर लिया। उन्हें बाबा गोरखनाथ की वह भविष्यवाणी भी याद आई, जिसमें उन्होंने नेपाल नरेश को श्राप देते हुए कहा था कि उनका राजवंश ग्यारहवीं पीढ़ी के बाद खत्म हो जाएगा। अब इसे पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की बदकिस्मती कहें या पिफर कुछ और कि वे ही ग्यारहवीं पीढ़ी के खेवनहार थे। ज्ञानेंद्र और उनका पूरा परिवार नेपाल की जनता की तकदीर का पफैसला करते करते अब अपनी तकदीर को सुधरने की कवायद में लग गया है। परंतु अब न तो सिंहासन है और न ही जन्नतनुमा महल।ज्ञानेंद्र अगर अपने महल से बेदखल हुए हैं तो उसमें अहम भूमिका माओवादियों की रही है। इस बात से कोई इनकार भी नहीं कर सकता। परंतु एक संशय सबके मन में है कि राजा के बाद अब नई सरकार नेपाल की आम जनता के लिए कितना कल्याण्कारी और सुकून देने वाली होगी? सियासी जानकार कहते हैं कि अगर नेपाल में नए सत्ताधरी राजशाही का पूरा स्मरण नेपाली जनता के मन से तभी दूर कर सकते हैं, जब वे उन्हें एक शुचितापूर्ण और विकासपरक शासनव्यवस्था देने में कामयाब हो पाएंगे। ज्यादातर नेपाली जनता के मन को यही बात कचोट रही है कि सैकड़ों साल से राजशाही के प्रति चले आए उनके विश्वास को राजवंश के ही एक राजा ने चकनाचूर कर दिया और अब जिन लोगों के पास उनके भाग्य की कुंडली जा रही है, उनके हाथ भी हजारों लोगों के खून से लाल हैं। ज्ञानेंद्र ने जब अपने भाई बीरेंद्र और उनके पूरे परिवार की मौत के बाद सिंहासन संभाला तो सोचा भी नहीं होगा कि इस अपमानजनक ढंग से उनको अपने राजपाठ से विदाई लेनी पड़ेगी। वर्ष 2001 से पहले नेपाल को छोड़ दुनिया के ज्यादातर लोग ज्ञानेंद्र और उनके नाम से अनजान थे। नेपाल की जनता भी उस वक्त अपने चहेते राजा बीरेंद्र के प्रेम और सम्मान में इस कदर नतमस्क थी कि उसे ज्ञानेंद्र को याद करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। परंतु एक जून 2001 की रात नेपाल के तत्कालीन राजा बीरेंद्र और उनकी प्रजा के लिए काली रही। पर ज्ञानेंद्र के लिए अपने भाई की मौत की एवज में एक साम्राज्य हाथ लग गया, जहां उन्हें अपनी महिमा और रसूख का डंका पीटने की पूरी आजादी थी। यह बात अलग है कि नरेश बीरेंद्र और उनके परिवार की हत्या की आरोप की कुछ छींटे उनकी ओर भी आईं। परंतु इस पर कुछ खुलकर सामने नहीं आ सका क्योंकि खुद वही पूरे निजाम के रखवाले थे। गौर करने वाली बात यह है कि ज्ञानेंद्र पहली बार राजा नहीं बने थे, बल्कि नेपाल का राजसिंहासन उनको उस उम्र में नसीब हो गया था जब उनको अपने माता-पिता के सिवाय किसी दूसरे की पहचान नहीं थी। दरअसल सन् 1950 में तत्कालीन प्रधनमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा और उनके दादा राजा त्रिभुवन के बीच तनाव इस स्तर तक बढ़ गया कि वे अपने बेटे और पोते यानी बीरेंद्र के साथ भारत चले आए। लेकिन उस दौरान तीन वर्षीय ज्ञानेंद्र वहीं रहे और राणा ने उनको खाली पड़ी राजगद्दी पर बैठा दिया। यह अलग बात है कि उस नन्हीं उम्र में वह नेपाल के राजशी सिंहासन पर केवल एक साल तक रह सके।बाद में राणा का राज नेपाली जनता के विरोध् के आगे ज्यादा चल न सका और पूरी सत्ता ज्ञानेंद्र के परिवार के हाथों में आ गई। परंतु ज्ञानेंद्र को दोबारा राजगद्दी पूरे पचास साल बाद नसीब हुई और वह भी तब जब वह खुद की और अपने बिगड़ैल बेटे पारस की करतूतों की वजह से बदनामी की चादर में लिपट चुके थे। उनके पहले राजा बीरेंद्र की छवि किसी देवता से कम नहीं थी। इसकी वजह यह थी कि वे नेपाली जनता की तरक्की के हर रास्ते की स्वीकार करते थे, चाहे वह रास्ता सत्ता पर उनकी पकड़ को कमजोर ही क्यों न कर रहा हो। जब बीरेंद्र के हाथों में नेपाल की कमान थी तब माओवादी अपनी हिंसक मंसूबों के बावजूद नेपाली आवाम का वह यकीन नहीं जीत पाए थे जो उन्होंने ज्ञानेंद्र के समय थोड़ी सी मसक्कत में प्राप्त कर लिया।कहने का मलब सापफ है कि मौजूदा समय में अपने और खानदान की बदतरी के लिए ज्ञानेंद्र की कारगुजारियां ही जिम्मेदार हैं। वे कहीं अध्कि चालाक बनने की कोशिश में भारत जैसे विशाल पड़ोसी देश के साथ भी ध्ूर्तता का परिचय देने लगे और चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाने लगे। महत्वपूर्ण है कि इस वंश का नाता भारत से पुराना है। इस वंश के पुरोध पृथ्वी नारायण शाह खुद उस समय भारत में स्थित गोरखा रियासत के राजा थे। सन् 1768 में उन्होंने काठमांडू राज्य का गठन किया जो बाद में नेपाल का शक्ल ले लिया। उसके बाद बीसवीं सदी में नेपाल कुछ सालों तक राणा परिवार के हाथों में संचालित हुआ लेकिन पिफर इसी शाह परिवार के हाथों में बागडोर आ गई। इतनी समृ( विरासत और भारत से निकटता के बावजूद ज्ञानेंद्र और उनके युवराज पारस ने वह सब कुछ किया जो उनके पूर्वजों ने कभी सोचा न था। उन्होंने राजशाही की सबसे बड़ी ताकत नेपाली जनता जनता के अटूट विश्वास को तार-तार कर दिया। हालत यहां तक आ गई कि उनके कदमों में अपना माथा टेकने वाले उन्हें रास्ता दिखाने लगे। अब खुद ज्ञानेंद्र पश्चाताप और सुधर के समंदर में डुबकी लगा लंे तो भी महल की ओर उनके लिए रास्ता बनाना असंभव सा लगता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सच हुई भविष्यवाणी&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;नेपाल के राजा वीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या की हत्या कथित तौर ;ज्ञानेंद्र के कथन के बतौरद्ध उनके ही पुत्रा के हाथों हुई। इस बात को स्वीकार करना नेपाली जनमानस के लिए कठिन था क्योंकि नेपाली जनमानस में ज्ञानेंद्र को ही दीपेंद्र सहित पूरे परिवार का हत्यारा मान लिया गया है, जो ठीक भी है।लेकिन यह भविष्यवाणी 230 साल पहले ही हो चुकी थी। यह भविष्यवाणी गोरखाओं के कुलगुरू गोरखनाथ ने की थी। नेपाल में यह किवदंती पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से आम जनता के बीच चर्चा का विषय रही है। नेपाल के इतिहास पर लेखक आदित्य मान श्रेष्ठ ने अपनी पुस्तक ‘ड्रेडपफुल नाइट-कारनेज ऐट नेपालीज रायल पैलेस’ ;एकता बुक्स, काठमांडो, नेपाल, 2001, पृष्ठ 92द्ध तथा प्रोपफेसर राजनाथ पांडेय ;ज्ञानपीठ प्राइवेट लिमिटेड, पटना, 1964, पृष्ठ परिशिष्ट क 86द्ध ने अपनी पुस्तक ‘नेपाल और नेपाल नरेश’ में इस किवदंती का जिक्र भी किया है। किवदंती के अनुसार पृथ्वी नारायण शाह उस वक्त आयु में छोटे थे। एक दिन गोरखाओं के कुलगुरू बाबा गोरखनाथ अपनी गुपफा से निकल कर उनके पास आए। बाबा गोरखनाथ ने प्रसाद के रूप में अपने मुंह से दही निकालकर पृथ्वी नारायण शाह के हाथों में रखा। लेकिन बालक पृथ्वी नारायण शाह ने उस प्रसाद को पफंेक दिया। पफेंका गया प्रसाद बालक पृथ्वी नारायण के पैरों की दस अंगुलियों पर गिरा। यह देखकर बाबा गोरखनाथ क्रोध्ति हो गए और उन्होंने पृथ्वी नारायण शाह को श्राप दिया कि उनके दस पीढ़ी बाद यानी ग्यारहवीं पीढ़ी में उनका वंश की सत्ता खत्म हो जाएगी। यह भविष्यवाणी अब सही साबित हुई है। महाराजा दीपेंद्र शाह इस वंशावली में ग्यारहवीं पीढ़ी हैं। नेपाली जनमानस ने ज्ञानेंद्र को बतौर महाराज कभी नहीं स्वीकार किया, बल्कि उनके खिलापफ विद्रोह का झंडा उठा लिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-8593530442445333576?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/8593530442445333576/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=8593530442445333576' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8593530442445333576'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8593530442445333576'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_8788.html' title='राजा-रानी बने कहानी'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' 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पर्यवेक्षक इस चुनाव को बेमानी करार दे चुके हैं। अप्रैल 2008 में जब जिम्बाब्वे में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुआ तो मुगाबे के प्रतिद्वंद्वी माॅगर्न स्वानागिरे ने पहले चरण में मुगाबे को पराजित कर दिया। इसके बाद मुगाबे के समर्थकों ने हिंसा का तांडव पूरे देश में मचा दिया और मजबूरन माॅर्गन को चुनाव के दूसरे चरण से खुद को अलग करना पड़ा। कुछ दिनों पहले जब मुगाबे ने खुद को विजयी करार दिया तो उनकी खूब छीछालेदर हुई। चैतरपफा घिरने के बाद वे थोड़ा नरम पड़े। परंतु अभी वही पुरानी मनमानी दोहरा रहे हैं कि वे किसी भी हाल में राष्ट्रपति की कुर्सी पर बने रहना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे बातचीत के लिए तभी तैयार होंगे जब सभी पक्ष उनको राष्ट्रपति मानने के लिए तैयार होंगे। उनकी इस जिद से अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक भी असमंजस में पड़ गए हैं कि वे मुगाबे से बातचीत कैसे बढ़ाएं? उल्लेखनीय है कि दुनिया के सभी बड़े देशों ने जिंबाब्वे को दी जाने वाली मदद तो रोक ही दी, साथ ही कई तरह के प्रतिबंध् भी लगा दिए हैं। प्रतिबंध् लगाने के मामले में अमेरिका और ब्रिटेन सबसे आगे रहे। लेकिन दूसरी ओर रूस और चीन ने मुगाबे के खिलापफ उठाए कदमों पर वीटो कर दिया। मुगाबे के प्रति मुगाबे की नाराजगी का आलम यह रहा कि ब्रिटेन ने उनको दिया गया नाईटहुड सम्मान भी वापस ले लिया। यह जिम्बाब्वे का दुर्भाग्य रहा कि देश पहले अंग्रेजी शासन का गुलाम रहा और अब अपने ही एक नेता का गुलाम है। 18 अप्रैल 1980 की तारीख जब ब्रिटेन ने जिम्बाब्वे को आजाद घोषित किया, उस समय पूरी दुनिया को लगा कि अफ्रीकी महाद्वीप का यह तंगहाल देश अब तरक्की की नई इबारत लिखेगा। लेकिन लोगों की यह उम्मीद परवान न चढ़ सकी। जिम्बाब्वे की आजादी से लेकर अब तक पूरी दुनिया ने भले ही बहुत कुछ बदलाव देख लिया हो लेकिन इस मुल्क की अवाम ने बदलाव के नाम पर सिर्फ इतना देखा कि उनकी बदहाली का ग्रापफ पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया। मुगाबे ने अपने 30 साल के शासनकाल के दौरान कुछ काम जरूर किए जिसे देश की जनता के लिए शुरू हितकर कहा गया। जिम्बाब्वे की जमींदारी प्रथा को तोड़ने का काम सर्वप्रथम उन्होंने ही किया। लेकिन आज तक जमीनों का उचित बंटवारा न हो सका। नतीजा यह रहा कि जमीन के लिए हिंसा का लंबा दौर चला। मौजूदा समय में जिम्बाब्वे दुनिया का एक ऐसा देश है जहां के हर सेक्टर में विकास दर शून्य के बराबर है। यही नहीं मंहगाई आसमान छू रही है और लोग बुनियादी जरूरतों को तरसने लगे हैं। एक अनुमान के अनुसार सन् 2000 से जिम्बाब्वे के अंदर 32 फीसदी सेे भी ज्यादा की दर से मंहगाई बढ़ी। वर्तमान समय में जिम्बाब्वे में बेरोजगारी की दर 80 फीसदी है। अगर देश में औसत आयु की बात करें तों पुरुषों की औसत उम्र 37 साल है तो वहीं औरतों की 34 साल है। जिम्बाब्वे की बदहाली के लिए पूरी दुनिया भले ही मुगाबे को कोस रही हो, पर मुगाबे खुद को इसके लिए जिम्मेदार नहीं मानते। उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोप की गलत नीतियां भी कापफी हद तक उनके मुल्क को बदहाल बनाने के लिए जिम्मेदार हैं। गौर करने वाली बात है कि वे माक्र्सवादी विचारधरा के नेता हैं और संभवतः यही वजह है कि उनकी अमेरिका जैसे देश से नहीं बनी। अब जब खुद उनके देश के लोग उनसे त्रस्त आ चुके हैं तो मुगाबे कैसे राष्ट्रपति बने रह सकते हैं? इस सवाल को आज हर कोई पूछ रहा है।  मुगाबे की बात करें तो उनके पास इसका एक ही जवाब है उनके सिवाय कोई दूजा जिम्बाब्वे की सत्ता नहीं संभाल सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-8057830000414229105?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/8057830000414229105/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=8057830000414229105' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8057830000414229105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8057830000414229105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_4249.html' title='मुगाबे तानाशाह हुआ...'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-2769969920220051002</id><published>2008-08-08T02:46:00.000-07:00</published><updated>2008-08-08T02:48:38.660-07:00</updated><title type='text'>मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों?</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;अनवारूल हक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देश  का आम मुसलमान पेसोपेश में है। आज से नहीं बल्कि पिछले साठ वर्षों से है। कभी उसके समर्पण का इम्तहान होता है तो कभी उसको शक के दायरे में खड़ा कर दिया जाता है। कई मौके तो ऐसे भी आते हैं जब सिर्फ और सिर्फ एक मुसलमान को ही अपने भारतीय होने की या पिफर कहें कि भारतीयता की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती मिलती है। इसमें वह मासूम और अपनी ही दुनिया में मशगूल मुसलमान भले ही बेकसूर हो, पर उसको कसूरवार बनाने का जुर्म हो रहा है और ऐसे जुर्म को अंजाम देने वाले भी गैर नहीं, बल्कि उन्हीं में से चंद हैं।कोई मजहब के नाम पर, कोई जिहाद के नाम पर तो कोई किसी बाहरी ताकत की पफरमानी के नाम पर या तो खुद गुमराह हो जाता है या फिर चंद लोगों को उस रास्ते पर धकेल देता है जो केवल वतनखिलापफी की ओर जाता है। नतीजा कोई और भुगतता है। कभी-कभार तो पूरी कौम जवाबदेह हो जाती है। ऐसे मौके पर मुस्लिम लीडरशिप का असल इम्तहान होता है, लेकिन अफसोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि एक मुसलमान को तो अब तक अपने रहनुमाओं से नाउम्मीदी ही हाथ लगी है।मसला आतंकवाद का हो, कश्मीर का हो, देश के किसी संवेदनशील मुद्दे का हो या पिफर ऐटमी डील का हो, हर जगह मुसलमानों को अलग-थलग करने की शातिराना कोशिश होती है और नतीजतन पूरी कौम पर एक इल्जाम, वह भी देश की मुख्यधरा से अलग होने का, स्वतः ही लग जाता है। देश के ज्यादातर मसलों पर मुसलमानों को अलग रखकर दृष्टिकोण बनाने का सिलसिला नया तो नहीं है। परंतु एक बात जरूर है कि उनको हमेशा ही देश के दूसरे समुदायों से अलग रखकर तौलने का क्रम मौजूदा दौर ज्यादा बढ़ा है।सवाल कई हैं। सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों है? इसका जवाब तलाशने की कोशश तो की ही जा सकती है। महत्वपूर्ण बात यह भी है आज जब हर जगह वैश्वीकरण और आध्ुनिकता की बयार चल रही तो ऐसे में मुसलमानों के लिए कोई दूसरा मानदंड तो नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। जिस सवाल को यहां खड़ा किया गया है, वह मजहबी तो हरगि”ा नहीं है, सियासी जरूर है। सियासी इसलिए भी है कि मुसलमान भी देश की हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बराबर का भागीदार और वाजिब हकदार है।वास्तविक के धरातल पर तस्वीर दूसरी है। कई बार ऐसा होता है जब देश के मुसलमानों को बाकी देश के साथ नजर आना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मुसलमानों को अलग-थलग रखने की साजिश होती है और ऐसा नजर आने लगता है कि वे देश की अवाम से अलग हैं। हाल ही में न्यूक्लियर डील को बेवजह मुस्लिम हितों के साथ जोड़ा गया। इस पर मुस्लिम समाज में जोरदार विरोध् होना चाहिए था। विरोध् तो हुआ, लेकिन एक स्वर में नहीं। यह बात थोड़ा हैरान करने वाली थी कि उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम-मजहबी लीडरों ने इस पर अपने पफायदे को माप-तौलकर बयानबाजी किया। कई उलेमा तो नंगे पांव उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्राी मायावती के दरबार तक पहुंच गए। उनका वहां पहुंचने का मकसद अपनी कौम की भलाई तो कतई नहीं था, बल्कि उसमें सियासत की बू सापफ नजर आ रही थी।ऐटमी डील पर देश के आम मुसलमान भले ही कोई ऐतराज न करे, लेकिन उनकी रहनुमाई का दावा करने वाले कुछ रहनुमाओं को इस पर ऐतराज था। इस ऐतराज का आधर क्या था? सिपर्फ और सिपर्फ अमेरिका। यह बात सही है कि अमेरिका से मुसलमानों का ऐतराज है और कुछ मामलों में यह तर्कसंगत भी है। वह इसलिए कि इराक, अफगानिस्तान और कुछ हद तक पिफलिस्तीन में अमेरिका की नीतियों से इन देशों के बाशिंदों को हिंसा का घोर तांडव झेलना पड़ा है और वे बाशिंदे मुसलमान हैं। ऐसे में आम मुसलमानों के अंदर भी अमेरिका को लेकर आक्रोश से भरी सोच का पनपना स्वाभाविक ही कहा जाएगा।परंतु सवाल यह है कि दुश्मनी या आक्रोश तो अमेरिका के साथ है, भारत के साथ तो नहीं। ऐटमी डील की वकालत करते हुए देश की सरकार जब बार-बार कह रही है कि इसमें भारत का महत्वपूर्ण हित जुड़ा है तो देश के हर कौम के नागरिक को, चाहे वह किसी मजहब का हो, डील का समर्थन करना चाहिए। लेकिन मुसलमानों के नजरिए से यह नहीं दिखा। कहने का मतलब यह है कि मुस्लिम रहनुमाई इस पर दोमुंहा राग अलापती नजर आई। यह बात दीगर है कि आम मुसलमान जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस कदर मशगूल है कि उसे डील की समझ शायद ही हो सकती है, उसने नाराजगी नहीं जताई। शायद उसे डील की परवाह इस मायने में भी न हो कि यह अमेरिका के साथ हो रही है। लेकिन अपफसोसनाक बात यह है कि कुछ लोगों ने मुसलमानों को इस मसले पर भी अलग-थलग करने का काम किया और वे सपफल भी रहे।केवल डील ही नहीं, देश और मसलों पर मुसलमानों को अलग करने की कोशिशें होती हैं और ऐसा करने वालों को दुर्भाग्यवश कामयाबी मिल जाती है। आतंकवाद के मुद्दे पर तो लोगों को बरगलाने और अनजान और बेकसूर मुसलमानों को भी कटघरे में खड़ा करने से परहेज नहीं किया जाता। आज आलम यह हो चुका है कि दुनिया के हर कोने में एक आम मुसलमान को भी शक की निगाह से देखा जाता है।आतंकवाद से अलग, अभी हाल ही कश्मीर में जब श्राइन बोर्ड की जमीन को लेकर बवाल खड़ा हुआ तो देश की मुख्यधरा से अलग एक बार पिफर मुसलमानों को अलग करने की कोशिश की गई और सारे मुसलमान नेताओं ने इस पर अपना मुंह सिल लिया। क्या जरूरत इस बात कि नहीं थी कि मुस्लिम लीडरशिप खुद को ऐसे मसलों पर स्पष्ट करे, जो संवेदनशील होते हैं। ऐसे मुद्दे पर मुस्लिम लीडरशिप की खामोशी आम मुसलमानों को ही नुकसान पहंुचाने का काम करती है।सवाल यह है कि मुसलमानों को गुमराह करने और उनकी बेचारगी का पफायदा उठाने का सिलसिला कब थमेगा? इसको रोकने के रास्ते क्या हैं? क्या मुसलमान इस हद तक जागरूक नहीं हैं कि वह खुद के इस्तेमाल को समझ सके? वह भला देश की धरा से क्यों अलग चलना चाहेगा? ऐसे कई सवाल हैं जो उठाए जा सकते हैं। लेकिन सबका जवाब सबसे पहले मुस्लिम कौम को ही देना होगा। बड़ी जिम्मेदारी मुस्लिम रहनुमाई की भी है। उसे अपनी भूमिका पर दोबारा सोचना होगा और अपनी लाइन भी बदलनी होगी। उनको इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि उन पर अब और कीचड़ न उछले। दायित्व उस आम मुसलमान का भी है जो तरक्कीपंसद है कि वह खुद को देश की मुख्यधारा से जोड़ कर चले। इसके बाद ही उस पर उठने वाली हर उंगली स्वतः ही गिर जाएगी।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-2769969920220051002?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/2769969920220051002/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=2769969920220051002' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/2769969920220051002'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/2769969920220051002'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_8996.html' title='मुसलमान मुख्यधारा से अलग क्यों?'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-8964584049515635967</id><published>2008-08-08T02:33:00.000-07:00</published><updated>2008-08-08T02:41:45.983-07:00</updated><title type='text'>‘कश्मीर को देश से अलग किया जा रहा है’</title><content type='html'>कश्मीर में पिछले कुछ सालों में जो कुछ भी हो रहा है, उस सबके माध्यम से वहां लगातार भारत विरोध्ी अभियान चलाया जा रहा है। हाल में ही अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दिए जाने से उपजे विवाद के बाद एक सवाल सभी के मन में उठना लाजमी था कि क्या वाकई कश्मीर भारत का हिस्सा है? इसी विषय पर पूर्व केंद्रीय मंत्राी और भाजपा प्रवक्ता &lt;strong&gt;राजीव प्रताप रूडी&lt;/strong&gt; से &lt;strong&gt;राजसरोकार&lt;/strong&gt; संवाददाता &lt;strong&gt;प्रसिध नारायण शाही&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;अनवारूल हक&lt;/strong&gt; की हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज के हालात को देखते हुए, क्या ऐसा लगता है कि कश्मीर सचमुच भारत का हिस्सा है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देखिए, इसके पीछे ऐतिहासिक कारण है। हमारे संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शहादत भी कश्मीर मुद्दे को लेकर ही हुई थी। वहां जो कुछ भी पहले हुआ, उसी का नतीजा है कि वहां अलगाववाद बढ़ता चला गया और हालत यहां तक आ गई है कि अपने देश का अभिन्न हिस्सा कहने के बावजूद इस तरह के सवाल पैदा हो रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;श्राइन बोर्ड जमीन मामले को लेकर विवाद का खड़ा होना क्या दर्शाता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दिए जाने पर मुझे नहीं लगता कि इतना बड़ा विवाद खड़ा होना चाहिए था। यह जमीन तो अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले श्रधालुओं के लिए दी गई थी, वह भी केवल दो महीने के लिए। परंतु आश्चर्य है कि वहां के लोगों में इतनी सहनशीलता भी नहीं है कि जमीन दिए जाने को पचा  सके। ऐसे में यह सवाल उठेगा ही कि आखिर यह देश कैसे चलेगा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तो क्या वहां के निरंतर बिगड़ते हालात के लिए धरा 370 ही जिम्मेदार है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कहीं न कहीं इस धरा 370 के कारण ही कश्मीर में अलगाव की स्थिति में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन चाहे कांग्रेस हो या पिफर कश्मीर के क्षेत्रीय दल, सभी इस पर सियासत करते रहे हैं। ये सभी लोग कश्मीर को देश से अलग-थलग करने का काम कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इसका मतलब कि धरा 370 जल्द से जल्द खत्म होनी चाहिए।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भाजपा का हमेशा यह मानना रहा है कि कश्मीर से धरा 370 हटनी चाहिए। हमने कहा है हम सत्ता में आएंगे तो धरा 370 को हटा देंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन आपकी पार्टी की सरकार तो केंद्र में छह साल थी। पिफर आपने क्यों ऐसा नहीं किया?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दरअसल वह गठबंध्न की सरकार थी। उस सरकार के एजेंडा से यह मुद्दा ही बाहर था। इसलिए हम कुछ नहीं कर सके। जब हमें पूर्ण बहुमत मिलेगा, तब हम इस पर जरूर कदम उठाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कश्मीर में अलगाववाद इस कदर है कि कुछ लोग वहां अलग मुद्रा की मांग करने लगे हैं। आप क्या कहेंगे?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह बिल्कुल गलत है। अगर किसी भी तरपफ से देश के भीतर अलग मुद्रा चलाने की मांग उठती है तो वह  देश को तोड़ने वाली बात है और भारतीय जनता पार्टी इसे कभी बर्दाश्त नहीं करेगी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कश्मीर में असैन्यीकरण की मांग पर आप का क्या कहना है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आज पूरा कश्मीर आतंकवादियों के निशाने पर है। पाकिस्तान से लगातार आतंकी घुसपैठ भी हो रही है। आतंकवादियों का मुकाबला करने के लिए ही वहां सेना तैनात है। दूसरी बात यह भी है कि इस तरह की मांग सरकार और सेना देखेगी। इसको राजनीतिक ढंग से नहीं देखना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वहां देश तोड़ने वाले को हमारे सुरक्षा बल ही सुरक्षा देते हैं। क्या कहेंगे आप?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं सहमत नहीं हंू कि भारतीय सुरक्षा बल ऐसे लोगों को सुरक्षा देते हैं। अलगाववादियों के साथ वही रवैया अपनाना चाहिए जो देशद्रोहियों के साथ अपनाया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कश्मीरी पंडित आज भी दर-बदर हैं। क्या वे कश्मीर वापस जा पाएंगे?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;निश्चित तौर पर जाना चाहिए। यह बात सही है कि पिफलहाल उनके अनुकूल माहौल नहीं है। भाजपा की यह मांग पहले भी रही है और आज भी है कि कश्मीरी पंडितों के साथ न्याय होना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-8964584049515635967?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/8964584049515635967/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=8964584049515635967' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8964584049515635967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8964584049515635967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_8696.html' title='‘कश्मीर को देश से अलग किया जा रहा है’'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-5215050943156162480</id><published>2008-08-08T02:27:00.000-07:00</published><updated>2008-08-08T02:28:00.611-07:00</updated><title type='text'>डील का फाइनल दौर</title><content type='html'>वियना में न तो पाकिस्तान का ईष्र्यालु विरोध काम आया और न ही हमारे देश में इस ऐतिहासिक डील के खिलापफ झंडा बुलंद करने वाले कुछ लोगों की बददुआएं। वहां तो केवल भारत की कूटिनीतिक और सामरिक समृधि का बखान हुआ और सर्वसम्म्ति से ऐटमी डील के मसौदे का हरी झंडी दे दी गई। कहने का मतलब सापफ है कि भारत-अमेरिका ऐटमी डील अब अपने आखिरी और बेहद निर्णायक पड़ाव में पहुंच चुकी है। आगामी 21 अगस्त को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी में इस डील को जाना है और इसके बाद ही दुनिया 45 ताकतवर देश इस पर अपना फैसला देंगे। लेकिन भारत और अमेरिका दोनों निश्चिंत हैं कि इस डील को एनएसजी में भी कामयाबी मिलकर रहेगी।दोनों देशों के इस दावे कि यह डील एनएसजी में पास हो जाएगी, बावजूद इसके अभी भी ज्यादा नहीं तो थोड़ा मुश्किलें जरूर हैं। लेकिन उन मुश्किलों को झेलने का काम भारत से ज्यादा अमेरिका को ही करना है। एनएसजी में सबसे बड़ा खतरा चीन हो सकता है। हालांकि इस पर भारत आशंका जाहिर करते हुए यह कहता रहा है कि चीन से उसे समर्थन मिलेगा। परंतु भारत की इस बात में सौ पफीसदी दम नहीं है। दरअसल, अमेरिका अपने वर्चस्व के बल पर दुनिया के और देशों को अपने फेवर में कर सकता, लेकिन यह सच्चाई है चीन आसानी से उसके बात को नहीं मानने वाला है। चीन को मनाने के लिए अमेरिका को अतिरिक्त उर्जा खर्च करनी पड़ेगी। गौर करने वाली बात है कि एनएसजी में हर सदस्य देश के पास वीटो का अध्किार है और इसी बात का डर है कि कहीं चीन इस डील परन वीटो ना कर दे। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका और भारत दोनों के समक्ष एक तरह का झमेला जरूर खड़ा हो जाएगा। चीन के अलावा पाकिस्तान ऐमात्रा रहा है जो चीन से कहीं ज्यादा इस डील का दबी जुबान में विरोध् करता रहा हैै। परंतु सुकून की बात है कि पाकिस्तान का एनएसजी से कोई वास्ता नहीं है और उसका इतना बड़ा कद भी नहीं है कि वह डील के खेल को अब बिगाड़ सके। ज्ञात रहे कि आईएईए में डील का मसौदा पेश हुआ था तो पाकिस्तान ने इसके विरोध् में खेमेबंदी प्रारंभ कर दी थी।लेकिन उसकी यह खेमेबंदी काम न आ सकी और साथ ही उसको अमेरिका की नाराजगी भी ढेलनी पड़ी। दूसरी ओर फ्रांस और आस्टेलिया जैसे देश भी पहले जो थोड़ा-बहुत असंतुष्ट नजर आ रहे थे, लेकिन उनको अमेरिका अपने साथ लाने में कामयाब रहा।इध्र, भारत सरकार इस डील पर अपनी सारी ताकत झोंक देना चाहती है। प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह और उनकी पूरी मशीनरी ऐसी कोई खामी नहीं छोड़ना चाहते जिससे इस डील के रास्ते में किसी भी तरह का प्रतिरोध खड़ा नजर आए। वहीं अपने कार्यकाल के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके अमेरिकी राष्टपति बुश ने अपनी पूरी फौज को इस डील के लिए कवच के रूप में खड़ा कर दिया है। विदेश मंत्राी कोंडलिसा राइस तो अंतर्रास्टीय स्तर पर इस डील के समर्थन में गोलबंदी करने का जिम्मा संभाले हुए हैं।अगस्त का महीना इस डील के लिए बेहद अहम होने जा रहा है। अब डील का पफाइनल दौर शुरू हो चुका है। अमेरिका और भारत की तैयारियां भी इसी के नजरिये से चल रही है। एनएसजी से पास होने के बाद इस पर आखिरी मुहर के लिए अमेरिकी कांग्रेस से लगनी होगी। उसको लेकर तो शायद ही कोई मुश्किल पेश आए। कहने का मतलब कि एनएसजी इस डील के लिए सबसे अहम और महत्वपूर्ण पड़ाव है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-5215050943156162480?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/5215050943156162480/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=5215050943156162480' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/5215050943156162480'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/5215050943156162480'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_2707.html' title='डील का फाइनल दौर'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-6588249037961990100</id><published>2008-08-08T02:00:00.000-07:00</published><updated>2008-08-08T02:11:33.141-07:00</updated><title type='text'>‘कश्मीर को पहले आजादी चाहिए’</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सैयद अब्दुल रहमान गिलानी&lt;/strong&gt; कश्मीरी अलगावादी खेमे में जानी-पहचानी आवाज हैं। संसद पर आतंकवादी हमले के षणयंत्र में इन पर भी कानूनी कार्रवाई की गई थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया था। कश्मीर में स्कूली शिक्षा और लखनऊ में काॅलेज श्क्षिा पाए गिलानी दिल्ली विश्वविदालय से अरबी में एम.ए., एम.फिल और पी.एच.डी. डिग्रियां की हासिल कीं। वर्तमान में दिल्ली के जाकिर हुसैन काॅलेज अरबी के एसोसिएट &lt;strong&gt;प्रोफेसर गिलानी&lt;/strong&gt; से &lt;strong&gt;राज सरोकार&lt;/strong&gt; के  लिए  &lt;strong&gt;अनवारुल हक&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;प्रसिद्ध नारायण शाही&lt;/strong&gt; द्वारा कश्मीर के संदर्भ में की गई बातचीत की संपूर्ण प्रस्तुतिः&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या कश्मीर मुद्दा हल होगा?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;ऐसा लगता ही नहीं कि कश्मीर के मुद्दे का हल निकलने वाला है।  जिस तरह से इस पर वार्ता हो रही है उससे तो लगता भी नहीं। इस मसले को हल करने के लिए तीन पार्टियां होनी चाहिए। यह कई बार कहा गया कि मसला हल हो चुका है, सिर्फ दस्तखत होने बाकी हैं। परंतु सारी बातें बकवास निकलीं। इस मसले को हल करने के लिए तीन पार्टियां होनी चाहिए- भारत, पाकिस्तान और कश्मीर। भारत और पाकिस्तान इसमें पार्टियां हैं क्योंकि दोनों के कब्जे में कश्मीर है। यह दोनों देशों के बीच जमीन के बंटवारे का मसला नहीं है। यह तो कश्मीरियों का मसला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आपके कहने का मतलब कि वार्ता गलत दिशा में है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बिल्कुल। जब वार्ता में उस पक्ष को शामिल ही नहीं किया जा रहा है जिसके बारे पफैसला किया जाना है, जब उसको ही नहीं पूछा जाएगा तो पिफर कहां से इस वार्ता को सही माना जा सकता है? पहली बात यह मसला द्विपक्षीय नहीं है। अब तक जितने भी समझौते भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सारे के सारे द्विपक्षीय थे। हर बार ये दोनों देश आगे बढ़े, लेकिन पिफर पता चला कि मुद्दा वहीं का वहीं है। दोनों देशों के बीच कश्मीर एक अहम मसला है। यही बुनियादी मसला है। मेरा कहना है कि इस मसले को हल करने में कश्मीरियों की भी नुमांइदगी होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कश्मीरी नुमांइदगी तो बिखरी हुई है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देखिए, कश्मीरी नुमांइदगी को पहचानना आसान नहीं है। आप कश्मीर में चुनाव कराएं। लेकिन चुनाव एसंबली के लिए नहीं बल्कि इस बात के लिए होना चाहिए कि कश्मीरियों को असल नुमांइदगी किसके पास है। ऐसे में इस तरह का चुनाव ही एक मात्रा रास्ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या कश्मीर का भौगोलिक ढांचा इसके लिए तैयार है जब कि लाखों कश्मीरी पंडितों को वहां से भगा दिया गया है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अगर इस तरह का पफैसला हो जाए तो मैं नहीं समझता के कोई कश्मीरी पंडितों को वोट देने से रोकेगा। किसी ने कभी भी यह नहीं कहा कि कश्मीरी पंडित वहां का हिस्सा नहीं हैं या उन्हें नहीं रहना चाहिए। उनको लेकर जो अनर्गल बातें होती हैं, सब बेबुनियाद हैं।  मेरा कहना है कि कश्मीर के प्रतिनिध्त्वि को देखने के लिए एक चुनाव होना चाहिए जिसमें पंडित भी शामिल हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मौजूदा समय में कश्मीरियों का सही नुमाइंदा कौन है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उस तरह से सर्वमान्य कोई नहीं है। लेकिन आज के समय में घाटी में गिलानी साहब ;सैयद अली शाह गिलानीद्ध सबसे बड़े नेता हैं। मीरवायज उमर पफारूख और यासीन मलिक भी हैं। इनको एक साथ रखकर कश्मीरियों का प्रतिनिध् िकहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नेशनल काॅन्Úेंस और पीडीपी क्या हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दोनों कश्मीर की नहीं बल्कि दिल्ली की नुमांइदगी कश्मीर में करती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आपका मतलब कि वे भारत सरकार के एजेंट हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जी बिल्कुल। यह किसी से छिपा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;परंतु ये पार्टियां तो चुनाव जीतकर आती हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर में जितने चुनाव हुए हैं, कोई भी निष्पक्ष नहीं थे।  इस बात को सभी जानते हैं। खुद आडवाणी जी अपनी किताब में इस बात को कह चुके हैं कि कश्मीर में कभी भी चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दिए जाने के मामले से उठे विवाद पर क्या कहेंगे?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यात्रा आज से नहीं हो रही है। करीब डेढ़ सौ साल से चल रही है। जब घाटी में मिलेटेंसी चरम पर थी तब भी कभी किसी यात्राी को निशाना नहीं बनाया गया। यात्रा हमेशा होती रही है और कश्मीरियों ने उसका स्वागत किया और उसमें सहयोग भी किया। इस बार जो मसला उठा, यह तीन पार्टियों नेशनल काॅन्Úेंस, पीडीपी और कांग्रेस की वजह से हुआ। पीडीपी और कांग्रेस ने मिलकर जमीन दी और पिफर अलग अलग जुबान बोलते रहे और इतना बड़ा नुकसान हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जमीन देना गलत था कि देकर वापस लेना?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दोनों ही निर्णय गलत था। जमीन भी वोट लेने की राजनीति से दी गई। वापस भी इसी के तहत किया हैै।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन जमीन तो केवल दो महीने के लिए दी गई थी। क्या कहेंगे?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देखिए, पहले यात्रा 15 दिन के लिए होती थी। अब दो महीने के लिए हो रही है। कश्मीरियों को हक छीनने के लिए किया गया कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह मुद्दा राजनीतिक था ही नहीं, इसको बना दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या घाटी से दहशतगर्दी खत्म कम होगी?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जो कुछ भी कश्मीर में हो रहा है या कहीं और हो रहा है, कोई कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्या है। लोगों को उनके अध्किार नहीं मिल रहे हैं तो उनको हथियार तक उठाना पड़ रहा है। लोगों को उनके अध्किार दे दीजिए, यह सब अपने आप खत्म हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारतीय कश्मीर में संघर्ष हो रहा है, लेकिन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में क्यों नहीं हो रहा है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इसके अपने कारण हैं। पाकिस्तान सरकार ने अभी हाल में कहा कि कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा नहीं है। इसका मतलब है कि पाकिस्तान कश्मीरियों के बुनियादी हक को मानता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत का तो कहना है कि कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नेहरू जी ने कहा था कि ‘कश्मीर अभिन्न हिस्सा नहीं है। अगर कश्मीरी यह पफैसला करते हैं कि वे भारत के साथ नहीं रहेंगे तो हमें दुख तो जरूर होगा लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते।’ दूसरी तरपफ भारतीय संसद 1994 में एक प्रस्ताव पारित करके कहती है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। अब आप समझ सकते हैं कि भारत की इस मसले पर पोजीशन क्या है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;इस मसले को सुलझाने में अमेरिका की क्या भूमिका देखते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा मानना है कि भारत और पाकिस्तान अगर इस पर गंभीर हो जाएं तो इसके मसले पर अमेरिका की कोई जरूरत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या कश्मीर से सेना हटनी चाहिए?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जब कश्मीर में सेना भेजी गई तो कहा गया कि सेना कश्मीरियों की मदद के लिए भेजी जा रही है। जिस दिन कश्मीरी चाहेंगे सेना घाटी छोड़ देगी। लेकिन आज क्या हो रहा है। सरकार वहां से सेना हटाने का नाम नहीं ले रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कश्मीरियों को पहले आजादी चाहिए या कि विकास?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले कश्मीरियों को आजादी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;क्या कश्मीर भारत का हिस्सा है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नहीं। कश्मीर न भारत का हिस्सा है, न पाकिस्तान का। कश्मीरियों को दोनों से आजादी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या कश्मीर मुस्लिम प्रश्न है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नहीं। इसको इस तरह से नहीं देखा जाना चाहिए। कश्मीर एक सियासी मसला है। कुछ लोग इस तरह की साजिश कर रहे हैं कि यह मसला कश्मीर का न होकर मुस्लिम मुद्दा होकर रह जाए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;कश्मीरी के अलगाववादी क्यों नहीं पंडितों को अपने साथ लाते?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ऐसा होना चाहिए और मुझे उम्मीद है कि आगे चलक ऐसा हमें देखने को मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आपका प्रिय भारतीय प्रधनमंत्राी कौन रहा है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर के नजरिए से सभी लोगों ने बातें की। पंडित नेहरू की बातों से लगता है कि वह कुछ बेहतर जरूर चाहते।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कौन ज्यादा गंभीर लगता है, भारत या पाकिस्तान?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दोनों गंभीर नहीं लगते। दोनों इस मसले को लटकाए रखना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कश्मीर मसला कब हल होगा?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अभी तो कुछ दिखता नहीं। अगर सारे पक्ष गंभीर हो जाए तो इसका हल जल्द हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-6588249037961990100?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/6588249037961990100/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=6588249037961990100' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/6588249037961990100'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/6588249037961990100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html' title='‘कश्मीर को पहले आजादी चाहिए’'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-8902320096549666830</id><published>2008-08-07T23:37:00.000-07:00</published><updated>2008-08-07T23:39:20.908-07:00</updated><title type='text'>क्या होगा?</title><content type='html'>हम  मीडिया को अपने लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं, लेकिन यह  स्तम्भ किस  disha me जा रहा है?  न्यूज़ channelon  ही  samacharo के  लिए yamraj बन  चुके हैं । कोई  प्रसारित है की  kayamat कब aane वाली है to कोई दूसरा dikhata है की चाँद पर  हसीना है। क्या  हम लोग  इतने मूर्ख हो गए हैं की  saphal होने के लिए इस had तक  जा  सकते हैं। अब  वह वक्त आ गया है की जब मीडिया को  ख़ुद स्तम्भ की  aavshyakta होगी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-8902320096549666830?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/8902320096549666830/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=8902320096549666830' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8902320096549666830'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8902320096549666830'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_5429.html' title='क्या होगा?'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-2936429599838690716</id><published>2008-08-07T03:41:00.000-07:00</published><updated>2008-08-07T03:42:28.845-07:00</updated><title type='text'>जमियत के महासचिव मदनी से बातचीत</title><content type='html'>‘मुसलमान साजिश का शिकार हुए हैं’आज देश ही नहीं, पूरी दुनिया में मुसलमानों को शक की नजर से देखा जाता है। भारत में  आजादी के साठ साल बाद भी मुसलमानों को मुख्यधरा से अलग करके देखा जाता है तो इसमें दोष मुस्लिम समुदाय का भी है। लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार वे रहनुमा हैं जो उनकी लीडरशिप का दावा पिछले साठ वर्षों से कर रहे हैं। इसी मुद्दे पर राज सरोकार संवाददाता अनवारूल हक ने जमियत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव और राज्यसभा सांसद मौलाना महमूद असद मदनी से बातचीत की। पेश हैं उसके प्रमुख अंश -&lt;br /&gt;क्या आप मानते हैं कि देश का मुसलमान मुख्यधरा से अलग है?देखिए, ऐसी सोच फैला दी गई है कि मुसलमान मुख्यधारा से अलग है। अगर ऐसा है भी तो इसके लिए मुसलमान दोषी नहीं हैं बल्कि वे लोग दोषी हैं जो मुसलमानों की तरक्की को पसंद नहीं करते। उन्होंने इस तरह के विचार को बढ़ाने का काम किया। आज इसका नतीजा सबके सामने है।मुसलमानों के मुख्यधारा से अलग होने की वजह क्या है?इसका जवाब बहुत बड़ा है। देश की आजादी के समय कुछ लोग खड़े हुए जिन्होंने मजहब के नाम पर देश के विभाजन की मांग की। जिन लोगों ने देश का विभाजन करवाया था, चाहे वे भारत के रहनुमा हों या पिफर मुस्लिम लीग के लोग हों, उनका तो कुछ नहीं बिगड़ा। लेकिन इस पूरे एपीसोड का जिम्मेदार मुसलमानों को करार दिया गया या कहें कि उनके ऊपर यह आरोप मढ़ दिया गया। मुसलमानों को मुख्यधरा से अलग रखने का सिलसिला भी उसी वक्त शुरू हुआ था और यह सियासी मकसद के लिए किया गया था।इसका मतलब कि मुसलमानों का इस्तेमाल किया गया है।जी, बिल्कुल। देखिए मुसलमानों को शिक्षा से दूर रखा गया। उनको बुनियादी सुविधओं से भी दूर रखा गया। इसी का नतीजा रहा कि मुसलमान पिछड़ता चला गया। इसका मतलब यह कि मुसलमानों को अब तक सिपर्फ इस्तेमाल ही किया गया है।इसका कसूरवार किसे कहेंगे?इसके लिए कसूरवार वही लोग हैं जिनकी देश में हुकूमतें रही हैं। उन्होंने ही मुसलमानों को इस हाल में पहुंचाया है। ऐसी सूरत पैदा कर दी कि हिंदुओं के जो मसले हैं उससे मुसलमान को कोई मतलब न हो और मुसलमानों के जो मसले थे उससे हिंदू बेखबर हो जाए। दोनों को अलग कर दिया गया और आज हालत सबके सामने है।न्यूक्लियर डील को मुसलमानों के साथ क्यों जोड़ दिया गया?मैं इसे गलत मानता हूं। हमने बार-बार यह बात कही है कि न्यूक्लियर डील को मुसलमानों से जोड़ना गलत है। यह मसला मुसलमानों का नहीं है, बल्कि यह तो पूरे देश का मसला है। अगर देश की सरकार या कहें कि सत्ता में बैठे लोग यह सोचते हैं कि न्यूक्लियर डील देश के लिए पफायदेमंद है तो मेरा मानना है कि यह मुसलमानों के भी हित में है।मुसलमानों का एक तबका तो इस डील का विरोध् कर रहा है।इस विरोध् को मजहबी नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। मुसलमानों में कुछ लोग हैं जो इस डील का विरोध् कर रहे हैं तो कुछ लोग इसका समर्थन भी कर रहे हैं। मैं यह बता दूं कि वे लोग इस डील का विरोध् या समर्थन मुसलमान की हैसियत से नहीं कर रहे हैं बल्कि एक भारतीय की हैसियत से कर रहे हैं। आप देखिए कि दूसरे समुदाय में भी इस डील को लेकर कहीं विरोध् है तो कहीं समर्थन है। इसलिए इसको देश की नजर से देखा जाना चाहिए न कि मजहब की नजर से।क्या अमेरिका के साथ इस तरह का समझौता होना चाहिए?अगर देश को चला रहे लोग समझते हैं कि यह डील देश हित में है तो हमें भी वहीं मानना है। वैसे भी अगर यह डील होती है तो एनएसजी में जो सभी 45 देश हैं, उन सभी से भारत को न्यूक्लियर एनर्जी मिल सकेगी। इसलिए बात केवल अमेरिका की नहीं है। सबसे बड़ी यह डील देश के भले के लिए की जा रही है।क्या आप खुद इस डील के पक्ष में हैं?अगर यह देश हित में है तो मैं इसके पक्ष में जरूर हूं।अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील या ईरान के साथ गैस पाइपलाईन, दोनों में से कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है?अगर दोनों से देश का भला होता है तो दोनों महत्वपूर्ण है। अमेरिका के साथ समझौते से हमें न्यूक्लियर एनर्जी मिलेगी तो वहीं ईरान के साथ समझौते से गैस प्राप्त होगी। देश की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए दोनों अहम हंै।कहीं भी कुछ आतंकवादी घटना होती है तो सबसे पहले मुसलमानों पर शक किया जाता है। ऐसा क्यों?ऐसा हो रहा है और यह बिल्कुल गलत है। मुसलमानों को बेवजह शक की नजर से देखा जा रहा है, जबकि मुसलमान अमनपसंद है। मैं मानता हूं कि देश का मुसलमान आतंकवाद का पक्षध्र कभी नहीं हो सकता। आतंकवाद को इस्लाम से बेवजह जोड़ा जाता है। इस्लाम का जन्म ही जुल्म और दहशतगर्दी के खात्मे के लिए हुआ है। पिफर इस्लाम को दहशतगर्दी से कैसे जोड़ा जा सकता है? असल में मुसलमान सजिश का शिकार हुआ है।एक राज्य के मुख्यमंत्री तो यहां तक कहते हैं कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान होता है। इस पर क्या कहेंगे आप?मैं समझ रहा हूं आप किसकी बात कर रहे हैं। मेरी समझ से वह मुख्यमंत्राी बावला हो गया है। हर आतंकवादी मुसलमान नहीं है।लेकिन आतंकवादी गतिविधियों में पकड़े जाने वाले सारे लोग मुसलमान ही होते हैं।ऐसी बात बिल्कुल नहीं है। देश के उत्तर-पूर्व में जो भी आतंकी घटनाएं होती हैं, उनमें 80 पफीसदी से ज्यादा गिरफ्रतारी गैरमुस्लिमों की होती है। नक्सल गतिविध्यिों में भी शामिल होने वाले ज्यादातर लोग मुसलमान नहीं होते। क्या नक्सल और देश के उत्तर-पूर्व में चल रही हिंसा आतंकवाद नहीं है? ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं? यह बात सिपर्फ मुसलमानों को बदनाम करने के लिए की जाती है।इन मसलों से हटकर सामाजिक मुद्दों की बात करें तो क्या अभी मुसलमानों में बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं है?बिल्कुल, सामाजिक स्तर पर अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। इसकी कोशिशें हो भी रही हैं, लेकिन कुछ हालात ऐसे रहे कि मुसलमान सामाजिक तौर पर उतना मजबूत नहीं हो सके जितना होना चाहिए था।मुस्लिम महिलाओें की हालत तो कहीं ज्यादा खराब है।ऐसा है। मेरा मानना है कि अभी सोशल रिपफाॅर्म की बहुत जरूरत है। इसके बाद ही महिलाओं और सबकी स्थिति में सुधर हो सकता है।मुसलमान वोट बैंक के रूप में कब तक इस्तेमाल होते रहेंगे?यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के मुसलमान आजादी के 60 साल बाद तक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा इसलिए हुआ कि उनको गुमराह किया गया और गुमराह उन लोगों ने ज्यादा किया जो सत्ता में थे। लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सिलसिला अब बंद होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-2936429599838690716?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/2936429599838690716/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=2936429599838690716' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/2936429599838690716'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/2936429599838690716'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_2741.html' title='जमियत के महासचिव मदनी से बातचीत'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' 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और आईअसाई  की करतूतों को छिपाने के लिए इस तरह के बयान दे रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-8574731282339345017?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/8574731282339345017/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=8574731282339345017' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8574731282339345017'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/8574731282339345017'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_6618.html' title='बेचारे मुशर्रफ़'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3337816548780237643.post-7142868947610112684</id><published>2008-08-07T00:43:00.000-07:00</published><updated>2008-08-07T01:04:26.436-07:00</updated><title type='text'>भारत को कमजोर मत करो</title><content type='html'>जम्मू  में पिछले कुछ दिनों लस जो कुछ भी  भी चल रहा है, उसे एक आन्दोलन तो कहा ही जा सकता है  लेकिन उसके दुष्परिणामों को हम नजरंदाज नहीं कर सकते ।  हम क्योँ नहीं सोचते की इससे जम्मू  और  कश्मीर के  बीच की दूरी  badti ही जा रही है । इससे यह भी संदेश जा रहा है की कश्मीर  भारत का  अंग नही है । यही नहीं इससे भारत के dushmano और algavvadiyon का housla भी बढ़  रहा है। देश में किसी को भी  इस  बात की ajadi katai नहीं है की वह भारत को कमजोर करे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-7142868947610112684?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/7142868947610112684/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=7142868947610112684' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/7142868947610112684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/7142868947610112684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post_07.html' title='भारत को कमजोर मत 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src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3337816548780237643-7785777410386902674?l=samajavlokan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://samajavlokan.blogspot.com/feeds/7785777410386902674/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3337816548780237643&amp;postID=7785777410386902674' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/7785777410386902674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3337816548780237643/posts/default/7785777410386902674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://samajavlokan.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='ये कैसे लोग हैं ?'/><author><name>Avlokan</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18431353904399972129</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://bp3.blogger.com/_waeYTl2TMU4/SFyeNvg7Y6I/AAAAAAAAAAM/7Kx39RAkg0E/S220/Gyan+Prakesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
